Saturday, 17 February 2018

99. इंसाफ का सूरज- वेदप्रकाश शर्मा

 रहस्य के आवरण में लिपटी एक रोचक कहानी।
इंसाफ का सूरज- वेदप्रकाश शर्मा, जासूसी उपन्यास, रहस्य-रोमांच, उत्तम।

 वेदप्रकाश शर्मा को सस्पेंश का बादशाह कहा जाता है। उनके उपन्यास में सस्पेंश इस हद तक होता है की पाठक भी आश्चर्यचकित सा रह जाता है की आखिर ये हो क्या गया।  पृष्ठ दर पृष्ठ जिस प्रकार इनके उपन्यासों की कहानी बदलती है पाठक सोच भी नहीं सकता।  इन्हीं विशेषताओं के कारण वेदप्रकाश शर्मा को सस्पेंश का बादशाह कहा जाता है।
       वेदप्रकाश शर्मा का उपन्यास इंसाफ का सूरज भी इसी प्रकार का उपन्यास है जिसमें‌ प्रत्येक पृष्ठ पर रहस्य/सस्पेंश का जाल बिछा हुआ है। पाठक एक रहस्य से बाहर निकलता है तो दूसरा रहस्य उसका इंतजार करता है।
    उपन्यास की कहानी है एक ठाकुर परिवार की हवेली की। ठाकुर परिवार में मुखिया है ठकुराईन सुलोचना देवी और उसके पुत्र श्रीकांत, उसकी पत्नी और एक छोटा बेटा विक्की,  ठकुराईन का दूसरा पुत्र है शूरवीर सिंह । उपन्यास की कहानी आरम्भ होती है शूरवीर सिंह की शादी से...   "उस अभिशप्त हवेली की दुल्हन बनने वाली हर लङकी को शादी के कुछ दिन बाद कत्ल कर दिया जाता है..शूरवीर की दो पत्नियों को कत्ल किया जा चुका है- पहले माधवी और फिर निशा, एङी-चोटी का जोर लगाने के बावजूद पुलिस आज तक पता नहीं लगा पाई कि हवेली की दुल्हन की हत्याएं कौन करता है?" (पृष्ठ-06)
       कोई भी व्यक्ति अपनी बेटी की शादी इस परिवार में नहीं करना चाहता, सभी उस हवेली को अभिशप्त मानते हैं और उन्हें डर भी है कहीं उनकी बेटी मौत का शिकार न हो जाये। लेकिन उसी गाँव का एक शराबी अपनी अनाथ भानजी मँजू की शादी शूरवीर सिंह के साथ तय कर देता है। और जब मँजू को इस बात का पता चलता है-
"न..नहीं ...!"-वीनस कि मूर्ति जितनी सुंदर -मासूम एवं भोली मंजू हिस्टीरियाई अंदाज में चीख पङी- " नहीं मामा..मैं हरगिज़ यह शादी नहीं करुंगी- हवेली की दुल्हन नहीं बनूगी मैं।"(पृष्ठ-06)
लेकिन लालची मामा के सामने मँजु की एक न चली।
"लालच और बेईमानी ऑक्सीजन नहीं कार्बन डाइऑक्साइड  है जो जिस्म में‌ पहुंचने के बाद इसे खोखला ही करती है।" (पृष्ठ-14) 
दुल्हन बनकर हवेली में आई उस मासूम की आँखों में दूर-दूर तक सिर्फ और सिर्फ मौत के साये नजर आ रहे थे। चेहरा किसी लाश के चेहरे की तरह निस्तेज - दिल‌ ने मानों मृत्यु से पहले धङकना बंद कर दिया था। (पृष्ठ-75)
       हवेली में मँजु को सभी हत्यारे ही नजर आते हैं। और उपन्यास यही आरम्भिक पृष्ठ तो मँजु के साथ-साथ पाठक को भी चौंकाने में अदभुत सक्षम हैं। न तो मँजु समझ सकती है किस पर विश्वास करुं और नहीं ही पाठक।
    सभी से डरी सहमी मँजु किसी पर विश्वास नहीं कर पाती और विश्वास करे भी तो किस पर उसे तो सभी एक जैसे ही नजर आते हैं।
कुबङे और बदसूरत बबरु ने उसे बुरी तरह से जकङ रखा था -मुँह पर जमें उसके हाथ में ऐसी सख्ती थी कि मंजु को वह बूढा नहीं लगा- हैरतवश फटी आँखों से उसने देखा की कमरे का दरवाजा इस वक्त अंदर से बंद है (पृष्ठ-39)
कभी उसे अपना पति खतरनाक लगता है तो कभी सास, कभी नौकर बबरू तो कभी घर आया हुआ बाबा चाण्डाल।
चाण्डाल बाबा- भूत -प्रेतों को अपने वश में रखने और तांत्रिक विद्या से किसी की भी हत्या करने में सिद्धहस्त एक दुष्ट तांत्रिक।(पृष्ठ-40)
       आखिर ऐसा क्या घटित हो रहा था हवेली में, और उसी घटित होने वाले घटनाक्रम के खिलाफ एक दिन मँजु की आवाज बुलंद हो ही गयी।
"किसी और की बात छोङिए मांजी, मगर मुझे हक है।"- चेहरे पर अजीब सी दृढता लिए मंजू कह उठी - " इस हवेली में क्या होता है, क्यों होता है। यह सब जानने का हक मुझे इसलिए है, क्योंकि मैं हत्यारे की अगली शिकार हूँ।"(पृष्ठ-80)
   लेकिन इन सब से परे एक ऐसा भी शख्स था जो भूत-प्रेतों पर विश्वास नहीं करता और वह है इंसाफ का सूरज। इंस्पेक्टर सूरज। जिसने स्पष्ट कहा- 
"आप विश्वास रखें सर.....रहस्य की सभी पर्तों पर से पर्दा उठाने के बाद हत्यारे को आपके सामने लाकर खङा कर दूंगा और मंजू की हिफाजत मेरा पहला मकसद होगा।"(पृष्ठ-17)
      इस रहस्य में लिपटी कहानी में एक नया मोड तब आता है जब उपन्यास में बिल्ली आती है। हालांकि बिल्ली तो मँजु की शादी में भी अपशगुन करती है। लेकिन ये बिल्ली तो पूरे घटनाक्रम तो ही बदल कर रख देती है। इस बिल्ली के आगमन से तो पाठक उछल कर खङा हो जाये। बहुत खतरनाक है ये बिल्ली । इस बिल्ली की एक  पंक्ति बहुत है।- "हल्लो..हल्लो ..मैं बिल्ली बोल रही हूँ।" (पृष्ठ-104)
      लेकिन जनाब किस्सा यहीं खत्म नहीं होता। अभी तो आ बिल्ली तक ही पहुँचे हो  अभी तो और भी जंगली जानवर यहाँ उपस्थित हैं। उपस्थित भी क्या खतरनाक तरीके से उपन्यास पर छाये हुये हैं। और ऐसा ही खतरनाक एक और जीव है - लोमङी।
 खुद लोमङी के मुँह से सुन लीजिएगा-
" लोमङी की आदत है, जब खुद को नहीं मिलता तो बिखेर देती है।"(पृष्ठ-110)
जहाँ बिल्ली की इंंट्री पाठक को चौंकाती है पूरे घटनाक्रम को बदल कर रख देती है वही लोमङी की इंट्री तो उपन्यास के खलनायक को ही हिलाकर रख देती है।
 उपन्यास की कहानी के बारे में जितना लिखा जाये उतना बहुत कम है। अगर कहानी का वास्तविक आनंद लेना है तो वेदप्रकाश शर्मा का उपन्यास इंसाफ का सूरज अवश्य पढें।

- क्या था अभिशप्त हवेली का रहस्य?
- कौन था शूरवीर सिंह की पत्नियों का हत्यारा?
- क्या मंजु की जान बच पायी?
- कौन थी बिल्ली?
-कौन थी लोमङी?
- आखिर लोमङी चाहती क्या थी?
- आखिर क्या घटनाक्रम घटित हो रहा था?
- क्या इंस्पेक्टर सूरज वास्तविक का पता लगा पाया ?
- इंस्पेक्टर सूरज का वास्तव में इंसाफ कर पाया?
   ऐसे एक नहीं अनेक प्रश्नों के उत्तर तो इंसाफ का सूरज उपन्यास पढकर ही मिल सकते हैं।
               
          इंसाफ का सूरज उपन्यास वास्तव में पठनीय है। उपन्यास की कहानी जिस प्रकार पृष्ठ दर पृष्ठ बदलती है वह वास्तव में बहुत रोचक है। उपन्यास के पात्र भी एक से बढकर एक हैं जो पाठक को बार-बार चौंकातॆ हैं। कौन सा पात्र कब कौन सा रंग बदल जाये पता ही नहीं चलता।

    निष्कर्ष- वेदप्रकाश शर्मा का प्रस्तुत उपन्यास 'इंसाफ का सूरज' रहस्य में डूबा हुआ वो कथानक है जो पाठक को अपने साथ जोङे रखने में पूर्णतः कामयाब है।
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उपन्यास- इंसाफ का सूरज
लेखक- वेदप्रकाश शर्मा
प्रकाशक- मनोज पॉकेट बुक्स
पृष्ठ-251
मूल्य-20₹

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