Thursday, 1 February 2018

99. डार्क हाॅर्स- नीलोत्पल

  IAS की तैयारी करते युवाओं की संघर्ष दास्तान।
डार्क हाॅर्स -नीलोत्पल, उपन्यास, रोचक, पठनीय।
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  नीलोत्पल मृणाल का उपन्यास डार्क हाॅर्स कहानी है दिल्ली के मुखर्जी नगर में IAS की तैयारी करने वाले उन युवाओं की जो एक स्वर्णिम भविष्य के निर्माण के लिए संघर्षपूर्ण जिंदगी जी रहें हैं।
       यह उपन्यास मात्र कल्पनाओं की उपज नहीं है वरन लेखक के जीवन का यथार्थ अनुभव है। लेखक ने इस विषय पर लेखकीय में लिखा है- संभवतः जिस उम्र में आदमी के पास  सबसे अधिक ऊर्जा रहती है, कुछ करने का पुरजोर  उत्साह होता है और दुनिया को देखने -समझने की सबसे ज्यादा जिज्ञासा होती है, मैंने अपने जीवन का वह सबसे चमकदार दौर आईएएस की तैयारी के लिए मुखर्जीनगर में गुजार दिया।
     
         अपने जीवन के इसी सत्य को लेखक नीलोत्पल मृणाल ने उपन्यास रूप में प्रस्तुत किया है।
     उपन्यास का मुख्य पात्र है संतोष कुमार। लेकिन यह मात्र एक संतोष की कहानी नहीं है। संतोष तो एक माध्यम मात्र है, संतोष के साथ-साथ न जाने अन्य कितने और अभ्यर्थियों की कहानी है जो  दिल्ली के मुखर्जी नगर में आईएएस की तैयारी करते हैं और इस दौरान वह कितनी बार जीते- मरते हैं। उनके और उनके माँ-बाप के क्या सपने हैं। इस इस उपन्यास में दर्ज हैं।
   यह उपन्यास अपने साथ अनेक कहानियाँ और घटनाएं समेटे हुए है। जहाँ कुछ कहानियाँ और घटनाएं हँसती है वहीं कुछ पाठक को रुलाती भी हैं। कुछ घटनाएं आईएएस की तैयारी के नाम पर मौज मस्ती करने वाले युवाओं की वहीं कुछ अपने स्वप्न साकार करने वाले संघर्षशील युवाओं के लिए प्रेरणा भी है।
    बत्रा- मुखर्जी नगर की वह जगह जहाँ चाय के नाम पर सिविल सर्विस की तैयारी करने वालों की महफिल  जमा होती है।  जिसने जितने अधिक मेंस लिखे हों वह महफिल का सबसे खास व्यक्ति होता  था। जिसने इंटरव्यू दे दिया वह अति-विशिष्ट की श्रेणी में आता था। (पृष्ठ -54) और बत्रा पर ऐसे -ऐसे धुरंधर जमा होते हैं जो सिगरेट के धुएँ से विश्व का नक्शा बना देते हैं।
कुछ नव युवा तैयारी के नाम पर मौजमस्ती करते हैं और इसे प्रगतिशीलता का नाम देते हैं। ऐसे युवाओं को गुरु विमलेंदू ने खूब फटकारा है।
- ये दारू पीना और सिगरेट उङाना कब से प्रगतिशीलता का पैमाना बन गया.....दारू और सिगरेट का खुलेआम पीना है ये कोई साहस नहीं बल्कि इसे उन्माद कहते हैं। (पृष्ठ-92)
और साहस क्या है- गुरु के शब्दों में
"हम में साहस है बालश्रम के विरुद्ध बोलने का । हम में साहस है दहेज प्रथा का विरोध करने का।.....हम में साहस...नारी मुक्ति...बाल विवाह...धर्म पर सवाल पूछने का। हम में साहस है सरकार की गलत नीतियों के विरुद्ध सङक पर उतर जाने का। हाँ, हममें ये साहस है। साहस इसे कहते हैं।" (पृष्ठ-92)
      मुखर्जी नगर में फैले कोचिंग सेंटर की वास्तविकता से भी परिचित करवाती है। ये कहानी मात्र मुखर्जी नगर की या आईएएस की तैयारी करने वाले युवाओं की नहीं, सभी जगह कुकरमुत्तो की तरह उगे कोचिंग सेंटर अभ्यर्थीयों के साथ मनमानी लूट करते हैं।
- पर ये तो मानना होगा कि यहाँ कुकरमुत्तों‌ की तरह उगे कोचिंग में क्वालिटी नहीं है। कुछ को छोङकर बाकी खाली मायाजाल फैलाए हुए हैं गुरु।"- विमलेन्दू ने कहा। (पृष्ठ-65)
   " हाँ, साला 2-3 साल तो ये समझने के लिए कोचिंग लेना होता है कि अब कौन सी कोचिंग में एडमिशन लेना अच्छा होगा।"- विमलेंदू ने कहा (पृष्ठ-65)
    कोचिंग सेंटर की बदतमीजी भी उपन्यास में उजागर हुयी है। एडमिशन लेते वक्त उनका व्यवहार अलग होता है और शुल्क जमा करवा देने के बाद अलग
" देखिए हमारा काम होता है हर स्टूडेंट का बेवजह उत्साह बढाना समझे आप? वर्ना हम भी जानते हैं कि सौ में दस ही सलेक्ट होते हैं बाकी गधे ही होते हैं पर हमें सबको घोङा कहना पङता है...। (पृष्ठ-100)
इन कोचिंग सेंटर की वास्तविक तो प्रफुल्ल बटोहिया, दुखमोचन और खगेंदर तूफानी जैसे सर से पता चलती है।  ये सर ऐसे है कि वे बैल को भी यह आशा बँधवा देते थे कि 'तुम एक दिन दूध दोगे, बस अच्छे से चारा-बेसन खाओ'। (पृष्ठ- 106) और ऐसे ही हैं  खगेंदर तूफानी।
खगेंदर तूफानी- खुद सात साल यहीं मुखर्जी नगर में आईएएस, पीपीएस सबकी तैयारी की थी पर न वहाँ सफल हुए न ही किसी विषय में कोई विशेषज्ञता ही हासिल कर पाए। हारकर 'लोकसेवक मेकर' नाम की कोचिंग खोली और उसके निदेशक बने। (पृष्ठ-104)
कोचिंग के दौरान पनपने वाले अनेक किस्से पाठक को खूब रोमांचित करते हैं। जहाँ अच्छे यारों के यार मिलते हैं वहीं कुछ दिलफरेब भी। जहाँ दोस्ती है, प्यार है और बेवफाई भी है। यहाँ अक्सर कोचिंग में अपने बगल में बैठी लङकी में लङका पहले अपनी प्रेमिका देखता है, फिर दुल्हन देखता है, फिर एक अच्छा दोस्त देखता है और अंत में बहन पर आकर समझौता कर लेता है। (पृष्ठ-134) और ऐसा समझौता उपन्यास का एक पात्र भी करता है।
  लेकिन कुछ अभ्यर्थी तो इससे भी दो कदम बढकर निकले-  गोरे लाल के कमरे पर जैसे ही उसकी कुक आती, एक गाना तभी हमेशा मोबाइल पर बजता था, 'हम होंगे कामयाब, हम होंगे कामयाब, एक दिन।'
संवाद-
किसी भी कहानी के संवाद उसके उद्देश्य को  स्थापित करने में महती भूमिका अदा करते हैं। इस उपन्यास के संवाद एक और जहाँ पात्र का चरित्र-चित्रण करने में सक्षम हैं वहीं कहानी को आगे बढाने में उपयोगी हैं।
अंग्रेजी जानने वाला वहाँ सियारों के बीच लकङबग्घे की तरह होता है। (पृष्ठ-61)
बुढापा आदमी का अंतिम बचपन है। (पृष्ठ-115)
लङको का मन वैसे ही साफ होता है जैसे नवंबर की दोपहर में आसमान होता है। (पृष्ठ- 134)
सिविल सेवा की तैयारी करने वालों से ज्यादा भयंकर आशावादी मानव संसार में और कहीं मिलना मुश्किल था। (पृष्ठ-147)
- अंग्रेजी व्यापार की भाषा है, उर्दू प्यार की भाषा है और हिंदी व्यवहार की भाषा है। (पृष्ठ-95)
  शीर्षक-
   किसी भी वस्तु का शीर्षक ही उसके प्रथम विशेषता होता है।
  उपन्यास का शीर्षक डार्क हाॅर्स क्यों है? हिंदी उपन्यास और अंग्रेजी शीर्षक। उपन्यास का शीर्षक चाहे जो भी हो पर इसका औचित्य उपन्यास के अंत में पता चलता है।
  लेखक ने भी इस विषय पर लिखा है- एक बात उपन्यास के शीर्षक पर भी कहूँगा।........डार्क हाॅर्स के नाम के कथानक से संबंध की तो भूमिका में नहीं बताऊँगा इसके लिए तो आपको यह उपन्यास पढना होगा।  
        सच मानिए जैसे ही आप इस शीर्षक की सत्यता तक पहुंचेंगे आपको भी यह शीर्षक रोचक लगेगा।
कमियां-
        - उपन्यास में कई जगह अश्लील शब्दों का प्रयोग किया गया है। जो कि मेरी दृष्टि में उचित नहीं है। पाठक अच्छी कहानी के कारण पढता है न कि गाली पढने के लिए। इस उपन्यास पर लेखक को साहित्य अकादमी का पुरस्कार सिर्फ अच्छे कथानक के लिए मिला है अगर इसमें से कुछ अश्लील शब्दों को हटा दिया जाये तो उपन्यास पारिवारिक रूप से भी पठनीय है।
   उम्मीद है इसका नया संस्करण जब भी आये तो उसमें से अश्लील शब्द न हों।
- मनोहर के चाचा का दिल्ली आगमन व उनका दिल्ली दर्शन विषय थोङा ज्यादा व अनावश्यक सा लगता है। हालांकि यह वर्णन भी रोचक है। क्योंकि स्वयं चाचा भी रोचक इंसान हैं।
एक उदाहरण देख लिजिएगा- लाल किले में जब चाचा को मनोहर ने खैनी खाने से मना किया तो चाचा ने भी गजब उत्तर दिया- "चलो जरा यहाँ खैनी खा लें, यादे रहेगा कि लाल किला में बैठ के खैनी खाए थे कबो।"- चाचा ने चहुँकते हुए कहा। (पृष्ठ-77)
    निष्कर्ष-
             मेरी दृष्टि में यह एक ऐसा उपन्यास है जिसे सभी उम्र वर्ग को पढना चाहिए। यह उपन्यास मात्र मनोरंजन नहीं है बल्कि संघर्षरत जीवन जीने वाले लोगों की जीवंत दास्तान है। एक ऐसी दास्तान जो कहीं आपको रुलाती है तो कभी हँसाती है।
         मैं जब इस उपन्यास को पढ रहा था तो स्वयं पात्रों के साथ जी रहा था। स्वयं को मुखर्जी नगर में पाया। कभी-कभी तो संतोष, गुरु, रायसाहब, विमलेंदू मनोहर, विदिशा और पायल के बारे में सोचने लगा था।
      उपन्यास बहुत ही रोचक है अवश्य पढें।
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बेहद दिलचस्प उपन्यास। अपने पहले ही उपन्यास में निलोत्पलने बड़ा साहस दिखाते हुए बेबाकी से यथार्थ की तलछट को कुरेदते हुए एक ऐसी दुनिया का सच लिखा है, जिस पर पहले कभी इतना नहीं लिखा गया. ये भोगे गए यथार्थ का दस्तावेज है. एक ऐसी रोचक और बौद्धिक दुनिया की गर्म भट्टी का सच लिखा है, जिसमें कई लोग तप के सोना हो जाते हैं तो कई जल कर खाक. 'डार्क हॉर्स' अंधेरे रास्ते से होकर उजाले तक का सफर है. नीलोत्पल की भाषा में रवानगी है, व्यंग में धार है, संवादों में संवेदना के गहरे उतार-चढ़ाव हैं. किस्सागोई का अपना अलग अंदाज है, जो पाठक को पढ़ने के लिए मजबूर करता है. 'डार्क हॉर्स' के रूप में शानदार शुरुआत के साथ भविष्य के एक बड़े लेखक के रूप में देख रहीं हूं. नीलोत्पल को बहुत सारी शुभकामनाएं।
- सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती चित्रा मृद्गुल
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उपन्यास- हार्क हाॅर्स
ISBN-
लेखक- नीलोत्पल मृणाल
प्रकाशक- हिंद युग्म
www.hindyugam.com
पृष्ठ- 174
मूल्य-175₹
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उपन्यास निम्न लिंक से मंगवा सकते हैं।
एमेजन- डार्क हाॅर्स

98. बनारस टाॅकिज- सत्य व्यास

        तीनों‌ मित्रों की हाॅस्टल गाथा।
बनारस टाॅकिज- सत्य व्यास, उपन्यास, रोचक, पठनीय।

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   सत्य व्यास का उपन्यास बनारस टाॅकिज कहानी है B.D. की। अच्छा तो आप B.D. का अर्थ नहीं जानते। चलो कोई बात नहीं, अक्सर ऐसा होता है। आप ने B.H.U. का नाम सुना है। अरे! क्या बात करते हो...ये भी नहीं सुना। इसीलिए कहते हैं बाउ साहब कि जरा इधर-उधर भी देखा कीजिएगा। (पृष्ठ-09)
         B.H.U. के B.D. में B.D. जीवी रहते हैं। अब आप पूछेंगे कि ये बी. डी. जीवी क्या बला है? रूम नंबर-73 में जाइए और जाकर पूछिए कि भगवान दास कौन थे? जवाब मिलेगा- घण्टा। (पृष्ठ-09)
   तो अब तो आप समझ गये होंगे किसकी चर्चा चल रही है।  ये भगवान दास है बाउ साहब। 'भगवानदास हाॅस्टल'। समय की मार और अंग्रेजी के भार से, जब काशी हिंदू विश्वविद्यालय सिमट कर B.H.U. हुआ; ठीक उसी समय 'भगवानदास हाॅस्टल' सिमट कर B.D. होस्टल हो गया। (पृष्ठ-09)
               तो यह उपन्यास कहानी कहता है भगवान दास होस्टल में रहने वाले मित्रों की।  काजो व्यक्ति विद्यार्थी जीवन में हाॅस्टल जिंदगी जी चुका है उसे इस उपन्यास में अपने जीवन की झलक नजर आयेगी। हाॅस्टल की जिंदगी में जो प्यार-मोहब्बत, मित्रों का स्नेह, आपसी झगङे वे सब इस उपन्यास में लेखक ने बुने हैं। लेकिन यह उपन्यास मात्र हाॅस्टल जीवन की कथा ही बयान नहीं करती इसके अलावा भी और बहुत कुछ कहती है, लेकिन वह सब कहा गया है भगवान दास हाॅस्टल के विद्यार्थी वर्ग के माध्यम से।
                वह क्या है उसका पता तो उपन्यास के अंत में जाकर ही पता चलता है। तब पाठक भी यही सोचता है की अच्छा कहानी यह थी। लेखक ने उपन्यास ने आरम्भ में स्पष्ट लिखा है।  हर घटना के पीछे कोई कारण होता है। संभव है कि यह घटित होते वक्त आपको दिखे; लेकिन अंततः जब यह सामने आएगा, आप सन्न रह जायेंगे।
          वह कौनसी घटना है यह तो उपन्यास पढकर ही जाना जा सकता है, लेकिन यह सत्य है की उस घटना को पढकर पाठक सन्न रह जाता है।
         192 पृष्ठ के उपन्यास में 168 पृष्ठ तक पाठक को पता तक नहीं चलता की आखिर लेखक इस उपन्यास में कहना क्या चाहता है, लेकिन पृष्ठ संख्या 168 से उपन्यास का वह भाग आरम्भ होता है जिस पर यह उपन्यास आधारित है।
         
उपन्यास में विभिन्न रंग पाठको को देखने को मिलेंगे। प्यार, गुस्सा, हास्य, व्यंग्य  आदि।
   उपन्यास में हास्यरंग भी जगह-जगह बिखरें हैं। ऐसा ही एक उदाहरण देखिए-
  दरअसल, परीक्षा में बैठने वाले अधिकतर लोगों को यह भी पता नहीं होता कि सवाल पूछा क्या गया है और जवाब लिखना क्या है? वो तो वही लिखते हैं जो उन्हें आता है। (पृष्ठ-129)
            यह तो मेरा भी व्यक्तिगत अनुभव है की विद्यार्थी वही लिखता है जो उसके दिमाग में है वह चाहे प्रश्न का उत्तर हो या न हो। ऐसा ही इस उपन्यास के पात्र करते हैं।
    .....पाण्डे सर ने हमसे कहा और आगे पढने लगे- "दूसरा केस है- Tyre vs.Tube......जी! आपने बिलकुल ठीक सुना। पार्टीज हैं, B. Tyre vs. C. Tube.....अब इस केस के फैक्ट पढ रहा हूँ- फ्लेंटिक अर्थात् वादी, टायर कंपनी में काम करता था। उसका काम टायर में हवा भरने का था। एक दिन अचानक टायर में हवा भरते वक्त ट्यूब फट गया। जिससे   सुनने  शक्ति  चली गयी। वादी ने अपनी टायर कंपनी से compensation  मांग की, जो कंपनी ने ठुकरा दी। इस पर वादी ने वाद दायर किया।" (पृष्ठ-131)

उपन्यास को विभिन्न खण्डों में  विभक्त किया गया है और प्रत्येक खण्ड का अलग से नाम है, जैसे- हम हैं कमाल के, ओये लकी लकी ओये, लगान, कोहराम, एक दिन अचानक

भाषाशैली-
     उपन्यास की भाषाशैली की बात करें तो यह परम्परागत कथा साहित्य से अलग हटकर है। उपन्यास में हालांकि सामान्य भाषा प्रयुक्त हुयी है लेकिन अंग्रेजी शब्दावली का जिस तरह से इस उपन्यास में प्रयोग हुआ है वह चिंतनिय है। आखिर लेखक इस तरह की भाषा को प्रयुक्त कर रहा है। क्या भारत में एक नयी भाषा शैली विकसित हो रही है। सामान्य बोलचाल के शब्दों तक तो सब ठीक था लेकि‌ लेखक ने पूरे के पूरे वाक्य ही अंग्रेजी भाषा और लिपि में लिख दिये।

           उपन्यास में कुछ जगह कुछ कमियां भी खटकी-

  उपन्यास प्रथम पुरुष में है लेकिन पृष्ठ संख्या ...में यह अन्य पुरुष में चला जाता है।

- उपन्यास में अंग्रेजी शब्दावली की भरमार तो है ही है, साथ में रोमन लिपि की की भी।
- अंग्रेजी में एक कहावत है- Birds of same feather flock to gether.(पृष्ठ-15)
- राजीव भी satellite love case का शिकार था। (पृष्ठ-50)
- हम कल रात को नंबर try किये थे। call detail में वही पहला नंबर था। (पृष्ठ-72)
- शिखा! Please don't mind - अगर मैं एक बात कहूँ?"- मैंने शिखा से कहा। (पृष्ठ-192)
    अब पता नहीं लेखक ने जगह-जगह इतनी अंग्रेजी शब्दावली/लिपि क्यों प्रयुक्त की है।
   शायद ही कोई ऐसा पृष्ठ हो जिसमें अंग्रेजी शब्दावली/लिपि न प्रयुक्त हो।

- उपन्यास में गालियों की संख्या ने स्वाद खराब कर दिया।  उपन्यास में गालियों का काफी प्रयोग हुआ है। अगर ये गालिया न भी होता तो भी चलता। पाठक गालियों के लिए नहीं, अच्छी कहानी के लिए पढते हैं।

निष्कर्ष-
     सत्य व्यास  का उपन्यास बनारस टाॅकिज  एक हाॅस्टल में रहने वाले कानून की पढाई करने वाले दोस्तों की कहानी कहता है।
       हालांकि उपन्यास में नयापन कुछ भी नहीं है, लेकिन उपन्यास का प्रस्तुतीकरण बहुत अच्छा है और उसी वजह से उपन्यास चर्चित भी रहा है।
        उपन्यास पूर्णतः मनोरंजक है पाठक को किसी भी स्तर पर निराश नहीं करेगा।
  पठनीय और रोचक उपन्यास है।

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उपन्यास- बनारस टाॅकिज।
ISBN-978-93-81394-99-1
लेखक- सत्य व्यास
प्रकाशक- हिंद युग्म
पृष्ठ- 192
मूल्य-140₹

प्रथम संस्करण- जनवरी 2015
नौवी आवृति- सितंबर 2017

97. बसेरा- कुशवाहा कांत

एक प्रेम कहानी, एक दर्द कहानी।
बसेरा- कुशवाहा कांत, सामाजिक उपन्यास, पठनीय।
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कुशवाहा कांत का उपन्यास बसेरा दो युवा दिलों की प्रेम कहानी है। एक ऐसी प्रेम कहानी जिसका बसेरा बनने से पहले ही उजङ जाता है।
        
  एक थी शमीम। जी हाँ! उसका नाम था शमीम, फूल सी कोमल, चन्द्रमा सी उज्ज्वल, मधु सी मिठास भरी एवं मदिरा सी मादक थी वह। यौवन मद से परिपूर्ण उसका ललितांग शरीर देखने वाले पर गजब ढाता था। (पृष्ठ-03)

         एक था मिस्टर जयंत। सेठ केशवदास का एकलौता पुत्र, जिसे शमीम से प्यार हो जाता है।

एक थे सेठ केशव दास। शहर के सबसे बङे रईस एवं सेठ थे। बङी-बङी जगहों में उनकी पहुंच थी, दूर-दूर तक उनका नाम था, मगर जरा वे क्रोधी स्वभाव के थे। (पृष्ठ-12)

  मिस्टर जयंत को शमीम से प्यार था और यह प्यार सेठ केशवदास को रास नहीं आया। और वह जयंत को समझाते भी हैं  "मैं नहीं चाहता कि तू अपना पवित्र धर्म छोङकर, अन्य धर्मावलम्बियों के संपर्क में रहे।" (पृष्ठ-42)
"मैं हिन्दू हूँ,  समाज का नायक हूँ, दुनियाँ की आँखों में आँखों में प्रतिष्ठित हूँ- मैं कैसे सह सकता हूँ कि मेरा बेटा एक यवन दुहिता का पाणिग्रहण करे। (पृष्ठ-112)
  इस बात का डर शमीम को भी होता है, इसलिए तो वह जयंत से कहती है- "मेरे सनम‌....मुझे धोखा  न करना...।"- (पृष्ठ-43)

लेकिन जयंत को अपने प्यार पर विश्वास है, वह शमीम को विश्वास दिलाता है, -" नहीं, नहीं शमीम। उस अंधेरे में ही हमारे प्रेम की ज्योति रास्ता दिखायेगी। हताश होने की बात नहीं।"(पृष्ठ-49)
      लेकिन इस प्रेम कहानी में एक पात्र और भी है, और वह है शिराज।  जो शमीम से कहता है -"मैं देख रहा हूँ कि आपके दिल में उस आवारा जयंत के लिए मुहब्बत पैदा होती जा रही है- यह आगे चलकर खतरनाक साबित होगी।"(पृष्ठ-52)

शमीम भी स्पष्ट कह देती है- "मुहब्बत में तकलीफ और खतरनाक बातों के लिए जगह नहीं है‌ मिस्टर शिराज।"-(पृष्ठ-52)

और एक थे जलालुद्दीन मिर्जा। शमीम के पिता। सेठ केशवदास के परम मित्र। जिनके लिए दोस्ती प्रथम है। दोस्त कितना प्यारा अलफाज है..जान देकर भी खरीद लेने लायक है यह चीज। (पृष्ठ-83).  

दुनिया की कोई भी ताकत मुझे केशव के खिलाफ नहीं ले जा सकती। मैं अपने सारे आराम की कुर्बानी कर सकता हूँ, उस दोस्त के लिए। (पृष्ठ- 83)

    जयंत और समीम का प्यार सेठ केशवदास को रास नहीं आता। दोनों के बीच धर्म और समाज की एक मजबूत दीवार आ जाती है। मजबूरन उसे एक ऐसा कदम उठाना पङता है और वह जा पहुंचता है मिसेज वर्मा तक। मगर मिसेज वर्मा का चरित्र जयंत के लिए अगम था, दुर्भेद्य था, वह समझ ही नहीं पाता था कि यह स्त्री क्या है। (पृष्ठ-84)

- क्या जयंत और समीम मिल पाये?
- क्या हुआ केशवदास के हिंदुत्व का?
- कैसी रही केशवदास और मिर्जा की दोस्ती?
- क्या भूमिका रही शिराज की?
- क्या अंत हुआ इस प्रेम कहानी का?
- कौन थी मिसेज वर्मा?
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               इन प्रश्नों के उत्तर तो कुशवाहा कांत का उपन्यास बसेरा ही दे सकता है।
   ‌यकीन मानें है प्रेम कहानी अन्य प्रेम कहानियाँ से कुछ अलग है और इसका समापन तो सहृदय पाठक को भावुक कर देगा।

भाषा-
अगर उपन्यास की भाषा शैली की बात करें तो इसकी भाषा शैली में जहाँ एक तरफ संस्कृतनिष्ठ शब्द प्रयुक्त हुये हैं वहीं आंग्ल भाषा के शब्द भी प्रयुक्त हुये हैं। जहाँ-जहां संस्कृत शब्दावली का प्रयोग किया गया है वहाँ -वहाँ भाषा शैली में निखार आ गया है-

- मानो साक्षात धवल-चन्द्र, व्योम मार्ग भूलकर इस भूखण्ड पर देदीप्यमान हो उठा हो।
- यह शस्यश्यामलता भूमि शुन्याकार आकाश मण्डल का चुम्बन करती है - वहीं, क्षितिज कर उस पार। (पृष्ठ-81)

कथन-
उपन्यास के कथन पाठक के हृदय को प्रभावित करने वाले हैं।
- औरतों के दिल की गहराई तक पहुंचना ..ताकत से बाहर की बात है। (पृष्ठ-41)

     कुशवाहा कांत का उपन्यास बसेरा एक प्रेम कहानी है। दो युवा हृदय जो प्रेम में मस्त हैं लेकिन समाज के बँधन इस प्रेम को स्वीकार नहीं ।
  उपन्यास बहुत ही रोचक और पठनीय है। पाठक के हृदय को छू लेने वाली मार्मिक रचना है।
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उपन्यास- बसेरा
लेखक- कुशवाहा कांत
प्रकाशक-
पृष्ठ-
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