Friday, 12 January 2018

94. आहुति- कुशवाहा कांत

सम्राट अशोक के जीवन का दूसरा पक्ष.
कुणाल के अंधे होने की कथा।

आहुति- कुशवाहा कांत, उपन्यास, रोचक, पठनीय, उत्तम।
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कुशवाहा कांत का मेरे द्वारा पढा जाने वाला यह प्रथम उपन्यास है। मैं हमेशा सोचता था की इनके उपन्यास वही पारम्परिक सामाजिक कथानक वाले होंगे। लेकिन कुछ तात्कालिक पाठकों से सुना की कुशवाहा कांत के उपन्यास बहुत अच्छे होते हैं। तब मैंने कुशवाहा कांत के बारे में जानकारी एकत्र करनी आरम्भ की।
  कुशवाहा कांत ने कुल 35 उपन्यास लिखे हैं, जो की क्रांतिकारी, ऐतिहासिक, सामाजिक व श्रृंगारिक श्रेणी के हैं।
  मेरे विद्यालय ( राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय-माउंट आबू, सिरोही, राजस्थान) के पुस्तकालय में से कुशवाहा कांत के पांच उपन्यास उपलब्ध हुये और पांच-सात उपन्यास में कुछ विक्रेताओं से खरीदे।

    प्रस्तुत उपन्यास 'आहुति' सम्राट अशोक के जीवन का एक काल्पनिक रूप प्रस्तुत करता है जो पाठक को आरम्भ से अंत तक आबद्ध रखता है।
सम्राट अशोक के पुत्र के अंधे होने की कथा काफी प्रचलित है, अब सत्यता क्या है, कुछ कहा नहीं जा सकता।  कुछ ग्रंथों में इस कहानी को पूर्णतः काल्पनिक बताया गया है।
  
         सम्राट अशोक के पुत्र कुणाल को लेकर इस कहानी का एक काल्पनिक विस्तार किया गया है जो काफी रोचक है।
       एक थी तिष्यरक्षिता।
पाटलिपुत्र राज्यप्रसाद की प्रधान परिचारिका। उसके मादक सौन्दर्य ने, मगधपति, प्रियदर्शी सम्राट अशोकवर्धन के हृदय पर अमिट छाप अंकित कर दी थी और सम्राट अशोक, पचास वर्ष की ढलती उम्र में भी, उस सुंदरी परिचारिका पर आशक्त हो गये थे। (पृष्ठ-03(प्रथम)
            सम्राट उसे परिचारिका नहीं मानते थे। वे तो कहते थे- "तुम परिचारिका नहीं हो तिष्ये...तुम मेरे हृदय की उन्मादकारिणी ज्वाला हो।" (पृष्ठ-05)
  
  
   वृद्धावस्था की ओर सम्राट और युवा तिष्यरक्षिता का प्रेम आंतरिक न था।
           सन् 242 ईस्वी पूर्व जब बौद्ध धर्म की द्वितीय बौद्ध महासभा का आयोजन होने वाला था तब सम्राट अशोक ने अपनी संतान को भी आमंत्रित किया।।
मौर्यकुल भूषण धर्मविवर्धन युवराज कुणाल देव भी उपस्थित हुये।  जब युवा कुणाल को तिष्यरक्षिता ने देखा तो वह उस पर आशक्त हो गयी। तिष्यरक्षिता युवराज का सौन्दर्य देख कर विस्मृत सी हो उठी थी। (पृष्ठ-11) और वह कुणाल को स्पष्ट कहती है- कैसे बताऊं तुम्हें युवराज.....कि मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती। (पृष्ठ-57)
             यही सौन्दर्य कुणाल के विनाश का कारण बन गया। तिष्यरक्षिता माता-पुत्र का रिश्ता भूल कर कुणाल पर मोहित हो उठी। लेकिन कुणाल के हृदय में माता के प्रति आदर भाव ही रहा और वह तिष्यरक्षिता के प्रेम प्रस्ताव को अस्वीकार कर देता है।
        आजकल तिष्यरक्षिता के हृदय में युवराज कुणाल के प्रति प्रबल घृणा उत्पन्न हो गयी थी। अपना उबलता हुआ प्रेम ठुकरा दिये जाने पर तो वह युवराज पर क्रोधित थी ही, इधर एक बात और उसके हृदय को उद्वेलित कर रही थी।
   वह यह कि युवराज कुणाल के जीवित रहते, उसका पुत्र सम्राट कैसे बनेगा? (पृष्ठ-89)

कुणाल की पत्नी कांचन का उपन्यास के मध्यांतर के पश्चात एक सशक्त वीर नारी का रूप उभर कर सामने आता है। वह अपने पति के साथ हुए अन्याय का विरोध करती है- मैं अपने पति के साथ किये गये अन्याय के लिए एक बार प्रलय तक मचा दूँगी....।(पृष्ठ-131) और वह इस बात को साबित भी कर देती है। एक पतिव्रता स्त्री जब क्षत्राणी रूप धारण करती है वह कितनी कठोर हो जाती है।

     कुणाल जहाँ एक वीर योद्धा और न्यायप्रिय व्यक्तित्व का धनी है वहीं वह माता-पिता का सचा आज्ञाकारी भी है। जब सम्राट अशोक का नकली आज्ञा पत्र उसे प्राप्त होता तब भी वह उसकी सत्यता न जांच कर अपनी आहुति दे देता है।
     कुणाल को पता है की तिष्यरक्षिता उसकी जान की दुश्मन है पर वह फिर भी उसके हृदय में तिष्यरक्षिता के प्रति आदर भाव कम नहीं होता।
"आज मैं तुम्हारे रक्त की प्यासी हूँ कुणाल....।"
" यदि माता की प्यास बुझ सके, तो पुत्र अपना रक्त देने को प्रस्तुत है।" (पृष्ठ- 188)
   
     
उपन्यास में धर्म चर्चा भी नये दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है।
"तो जन्म धारण करने से पहले मनुष्य क्या था महात्मन?"- किसी ने पूछा।
" वीर्य श्रोत में एक कीट के रूप में विद्यमान था"- महात्मा यश ने उत्तर दिया, "उस वीर्य कीट ने गर्भ में जाकर जीवात्मा का रूप धारण किया और समय आने पर मनुष्य के रूप में अवतरित हुआ...अब प्रश्न उठता है इस वीर्य कीट की उत्पत्ति कैसे और किससे हुई?................।" (पृष्ठ-167)
    इस प्रश्न का उत्तर तो उपन्यास पढकर ही मिल सकता है।
   उपन्यास में धर्म- अधर्म और एक सच्चे भिक्षु का कर्तव्य भी वर्णित है।
             "वत्स!....महात्मा यश ने कहा- "न्याय धर्म है और अन्याय अधर्म है....न्याय पुण्य है और अन्याय पाप....प्रत्येक भिक्षु का कर्तव्य है कि वह धर्म को प्रोत्साहन दे और अधर्म को दूर करे...पुण्य का प्रसार करे और पाप भावना को भस्मीभूत करके अंत:करण को स्वच्छ रखे.....।" (पृष्ठ- 173)

संवाद-
           किसी भी कहानी के संवाद उसकी जान होते हैं। संवाद ही पात्र के विचार-भाव प्रकट करते हैं और संवाद ही कथा को आगे बढाने में सहायक होते हैं।
       आहुति उपन्यास के संवाद कथा अनुरुप ही हैं।
उदाहरण
स्त्री के हृदय में वासना का नृत्य अत्यंत भयंकर होता है। (पृष्ठ-63)

भाषा शैली-
             उपन्यास की भाषा की बात करें तो यह हिंदी लिखित है पर संस्कृतनिष्ठ शब्दावली का प्रयोग किया गया है।  कहानी बौद्ध धर्म से संबंधित है और उस समय की भाषा पाली थी। लेकिन पाली भाषा का जन्म भी संस्कृत से ही हुआ है।
          उस समय की भाषा शैली दिखाने की दृष्टि से संस्कृतनिष्ठ शब्दावली का प्रयोग उचित ही है।

पात्र-
       उपन्यास के प्रमुख पात्रों का संक्षिप्त परिचय।

अशोक-          पाटलिपुत्र का सम्राट।
असंधिमित्रा-   सम्राट अशोक की रानी।
तिष्यरक्षिता-   अशोक की परिचारिका, रानी।
कुणाल-          अशोक का पुत्र, वीर योद्धा।
कांचन-           कुणाल की पत्नी, वीर नारी।
संप्रति-           कुणाल का पुत्र।
महेन्द्र-            अशोक का पुत्र, धर्मप्रचारक।
संघमित्रा-       अशोल की पुत्री, धर्मप्रचारक।
दशरथ-          अशोक का पुत्र.
यश-               धर्मगुरु।
त्र्यम्बक शास्त्री- राज वैद्य/ भिषग्शिरोमणि।
आमात्य श्रेष्ठ-
तक्षशिलाधीश
गोपक चन्द्रभाल- तक्षशिला का विद्रोही, कुणाल का मित्र।
रुद्रसेन-               तिष्यरक्षिता का विश्वस्त सहायक।
       इनके अतिरिक्त भी उपन्यास में अन्य पात्र उपस्थित हैं।

           छल-फरेब, धोखा-षड्यंत्र, प्रेम-प्रतिशोध की पृष्ठभूमि पर रचा गया यह उपन्यास पाठक के अंत:करण में स्थापित होने में सक्षम है।
    कुशवाहा कांत की लेखनी की यह एक एक विशिष्ट रचना है।
     उपन्यास का समापन इतना भयानक है की उसे शब्दों में वर्णित करना भी असंभव सा लगता है।
स्वयं भिक्षु कुणाल भी उस दौरान वहाँ रुकने में असमर्थ हो गये। " मैं यहाँ नहीं रह सकता...नहीं रह सकता।"- कहते हुए पागल से युवराज कुणाल सभाभवन से भाग खङे हुए।

निष्कर्ष-
              पाटलिपुत्र सम्राट अशोक के पुत्र कुणाल के जीवन के एक प्रसंग को आधार बना कर लिखा गया यह उपन्यास वास्तव में रोचक और पठनीय है।  हालांकि कहानी की सत्यता पर कुछ कहा नहीं जा सकता पर कहानी का प्रस्तुतिकरण सार्थक रहा है।
         अगर कहानी को पूर्णतः काल्पनिक भी मान लिया जाये तो भी कहानी की सार्थकता यथावत रहेगी।
      मनोरंजन और इतिहास, सत्य और कल्पना का अद्भुत मिश्रण पाठक को इस उपन्यास में मिलता है।
     पाठक को किसी भी स्तर पर उपन्यास निराश नहीं करेगा।
  मेरी व्यक्तिगत राय से यह उपन्यास पठनीय है ।
अगर आप कुछ अलग हटकर और सार्थक पढना चाहते हैं तो कुशवाहा कांत का उपन्यास आहुति अवश्य पढें।

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उपन्यास- आहुति
लेखक- कुशवाहा कांत
पृष्ठ- 222

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