Monday, 15 January 2018

96. लवंग- कुशवाहा कांत

एक प्रेम कहानी दर्द भरी।
लवंग- कुशवाहा कांत, उपन्यास, सामाजिक, रोचक, पठनीय।
- - -- --- --- - -- - - ---- - -- -- --- --- ---- -- --
   लवंग कहानी एक अमीर बाप के शराबी और वेश्यागामी पुत्र की कहानी है। लेकिन शराब और शबाब उसे खत्म करने की कगार पर है पर वह उन्हें छोङ नहीं पाता। लेकिन तब उसे मिलती है एक सच्चे प्यार वाली लेकिन क्या वह सच्चे प्यार के सामने अपने को बदल पाया।
      कुशवाहा कांत की लेखनी से निकला एक जबरदस्त कथानक है लवंग।

            
            अमीर बाप के एकमात्र पुत्र जयराज का संपर्क एक वेश्या गुलशन से होता है।  यह जो गुलशन है- वह आँधी है। आँधी के प्रबल वेग की तरह उसके पास यौवन का उन्मादकारी आकर्षण है। (पृष्ठ-141)  और उसके आकर्षण में फंस है जयराज।  भी एक ऐसी वेश्या-
   सूरत पर मिठास-
   और दिल में जहर
यही है एक वेश्या की परिभाषा।(पृष्ठ-26)
        लेकिन जयराज को एक अमवा गांव की, कंजर जाति की, तमाशा दिखाने वाली लङकी लवंग पसंद आ जाती है। - एक अमीर और एक गरीब- दोनों के हृदयों पर प्रेम के मादक करों ने अपनी छाया कर रखी थी और वे दोनों प्राणी उस प्रेम सरोवर में गोते खाते हुए अपनी अमीरी और गरीबी का अस्तित्व तक भुल गये थे।
यह था प्रेम।
जिसके आगे संसार के समस्‍त भेदभाव तुच्छ एवं हेय हैं। (पृष्ठ-176)
और वह लवंग  के लिए गुलशन का अपमान कर देता है। नारी सब कुछ सहन कर सकती है, परंतु अपना अपमान वह कभी नहीं सह सकती- सो भी एक वेश्या।( पृष्ठ-24)
        गुलशन भी अपना अपमान सहन नहीं कर पाती। वह प्रतिशोध की अग्नि में जलती है।  प्रतिशोध की ज्वाला शांत करने के लिए एक वेश्या के पास शारीरिक शक्ति अथवा भाले-बरछी, तलवार इत्यादि नहीं होते, उसके पास होती है जबान शहद से भी मीठी, हरकतें- शराब से भी मादक, हृदय- जहर से भी तीव्र। (पृष्ठ-71)
             गुलशन जैसी स्त्री जब अपने प्रतिशोध पर उतरती है तो एक हंसता - खेलता संसार तबाह कर देती है। " एक तवायफ का दिल पत्थर का होता है, जो टूट जाता है, मगर पिघलता नहीं।" - गुलशन ने कहा। (पृष्ठ- 17)
       लवंग का भाई है पंचम और पंचम की प्रेयसी है गांव के मुखिया की पुत्री केसर। पंचम का दोस्त धन्ना इस प्रेम प्रसंग का दुश्मन है।  कंजरों का सारा गिरोह धन्ना को जानता था- यह भी जानता था कि यह वह साँप है, जिसके डँस लेने की कोई भी दवा नहीं, यह वह जहर है, जिसके पी लेने पर जीवन की कुछ भी आशा नहीं। (पृष्ठ-76)
                                     गुलशन की वजह से जयराज और लवंग में दूरी आ जाती है और धन्ना की वजह से जयराज और पंचम दुश्मन हो जाते हैं। जयराज को नहीं पता के पंचम लवंग का भाई है। जयराज की वजह से पंचम जेल भी चला जाता है।
पंचम तो यहाँ तक धमकी दे देता है- "जा तो रहा हूँ,- जाते-जाते पंचम बोला- "मगर याद रखना बाबू, मैं खून का प्यासा हूँ। अगर जिंदा रहा, तो तुम्हारे लहू से जमीन लाल कर दूंगा....।"-(पृष्ठ-174)
     

- क्या जयराज और लवंग का प्यार सफल हो पाया?
- क्या जयराज गुलशन के जाल से निकल पाया?
- क्या पंचम और केसर मिल पाये?
- धन्ना ने जयराज और पंचम में दुश्मनी कैसे पैदा की?
- क्या परिणाम निकला जयराज और पंचम की दुश्मनी का?
-
   ऐसे एक नहीं अनेक प्रश्नों के उत्तर तो कुशवाहा कांत की लेखनी से निकल उपन्यास लवंग को ही पढकर मिल सकते हैं।

            इस उपन्यास में एक बात और विशेष है वह है पश्चिमी अंधानुकरण का विरोध। भारतीय चिकित्सा पद्धति और पश्चिम की चिकित्सा पद्धति का संघर्ष भी दृष्टिगत होता है।
   कुशवाहा इस दृष्टि से भी प्रशंसनीय हैं की पराधीनता के समय में भी उन्होंने अपने उपन्यास में पश्चिमी जीवन शैली का विरोध दर्शाया। उनके उपन्यास भंवरा में भी अंग्रेजों का विरोध दर्शाया गया है।
           
            लवंग उपन्यास एक सामाजिक उपन्यास है, पर उपन्यास बहुत सरस और रोचक है। पाठक को कहीं भी ऊब महसूस नहीं होती। हालांकि समापन से कुछ पहले लगता है की उपन्यास में कुछ व्यर्थ के दृश्य दर्शाये गये हैं पर उपन्यास समाप्ति पर सब व्यवस्थित हो जाता है।
     जयराज के पिता गंगाराम की शादी दिखाना थोङा अटपटा सा लगता है। हालांकि लेखक ने इसे समाज सुधार के दृष्टि से दिखाया है। पर उपन्यास पढने पर यह प्रसंग हजम नहीं होता।

संवाद-
  संपूर्ण उपन्यास संवाद के स्तर पर बहुत अच्छा कहा जा सकता है। संवाद पात्रानुकूल और सार्थक हैं। संवाद कहानी को दशा और दिशा प्रदान करने में सहायक हैं।
कुछ उदाहरण देखें-
  शराब जैसी बुराई का विरोध भी दर्ज किया गया है और इसे आधुनिक विष की उपाधि दी है।
- " जो शराब पीता है, वह खुद अपनी मौत खरीदता है।"-(पृष्ठ168
- जयराज ने चुपचाप वह आधुनिक विष पी लिया। (पृष्ठ-20)
- शहरों में शरीफ गुण्डें रहा करते हैं- (पृष्ठ-50)
- बुढापा एक वैषम्य अभिशाप है।
   बुढापा मृत्यु का भीषण प्रतीक है। (पृष्ठ-)
- मनुष्य ने सदा अपनी निर्बलता के समक्ष झुकना सीखा है। अपनी कमजोरी पकङ लेने वाले के सामने नेत्र अपने आप झुक जाते हैं। (पृष्ठ- 115)
- स्त्री का मूल्यांकन करने वाला पुरुष ही है और पुरुष को पथभ्रष्ट करने वाला हू स्त्री का अनुपम‌ सौन्दर्य। (पृष्ठ-134)
- दौलत का गरूर, हुस्न के गरुर से भी ज्यादा भारी होता है। (पृष्ठ-143)

पात्र-
उपन्यास के पात्रों का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है।

अमवा-     लवंग का गांव
लवंग-      उपन्यास नायिका
लवंग की‌ मां
पंचम-       लवंग का भाई
चौधरी- अमवा गांव का प्रमुख।
केसर-       चौधरी की बेटी
जयराज-    उपन्यास नायक,  सेठ गंगाराम का बेटा।
सेठ गंगाराम- शहर का प्रतिष्ठित व्यक्ति।
गुलशन-        एक वेश्या।
ताल खान
लखना-        जयराज का नौकर।
धन्ना-            खलनायक, पंचम का मित्र।
जम्मू-           भालू, पंचम का भालू।
अन्य पात्र- ग्रामीण, पुलिस, जज, डाॅक्टर इत्यादि ।
-------
उपन्यास- लवंग
लेखक-    कुशवाहा कांत
प्रकाशक- चौधरी एण्ड संस, बनारस
पृष्ठ-
मूल्य- 

Sunday, 14 January 2018

95. भंवरा- कुशवाहा कांत

एक प्रेम कहानी, एक दर्द कहानी।
भंवरा- कुशवाहा कांत, उपन्यास, सामाजिक, पठनीय।

कुशवाहा कांत के उपन्यास स्वयं में एक अलग दुनिया होते हैं। इनकी शैली रोचक व मन को छू लेने वाली होती है।
इनका उपन्यास भंवरा एक साथ कई कहानियाँ कह जाता है। एक तरफ जहाँ प्रेम कथा है, वहीं दूसरी तरफ देश-प्रेम और मानवता की चर्चा भी है। धर्म भी है और मनुष्य का मनुष्य के प्रति दायित्व भी है।
         उपन्यास एक साथ कई आदर्श प्रस्तुत करता है लेकिन कहीं से बोझिल प्रतीत नहीं होता। पाठक को स्वयं में बांधे रखने में उपन्यास सक्षम है और यही एक सफल उपन्यास की विशेषता होती है।

                 भंवरा कहानी है करमपुर गांव के बङे ठाकुर/ बङे राजा चन्द्र किशोर नारायण सिंह के पुत्र कमल किशोर नारायण सिंह के प्रेम की कहानी सिर्फ प्रेम कथा ही नहीं है इसके अलावा करमपुर गांव में आयी बेरोजगारी और धार्मिक उन्माद की कहानी और उनके पीछे शैतानी सोच की भी है।
  
             कमल को प्रेम है अपने ही गांव के एक ग्वाले की पुत्री मेहंदी से लेकिन यह प्रेम बङे राजा को पसंद नहीं।
अमिलहा के ठाकुर जगदीश सिंह एक दिन बङे राजा के यहाँ कमल हेतु अपनी पुत्री राजमणि का रिश्ता लेकर आते हैं लेकिन यह रिश्ता ठकुराइन को पसंद नहीं है।
           लेकिन कमल और राजमणि के बीच प्रेम पनप जाता है और वहीं बङे राजा और जगदीश सिंह के बीच दुश्मनी पनप जाती है।
        एक तरफ मेहंदी है और एक तरफ राजमणि। कमल को दोनों से प्रेम है। मेहंदी को ठाकुर पसंद नहीं करते और राजमणि को ठकुराइन।

        करमपुर गांव में एक अंग्रेज टाॅमसन व्यापारिक उद्देश्य से आता है और अपनी निकृष्ट मानसिकता से हिंदू-मुस्लिमों में धार्मिक विद्वेष पैदा करता है।
          गांव में बेरोजगारी भी टाॅमसन के कारण पैदा हो जाती है।
जब से करमपुर में टामसन का पदार्पण हुआ था, तब से वहाँ के हिंदू-मुसलमानों का आपसी वैमनस्य बढता जा रहा था। (पृष्ठ-187)
और इन सब परिस्थितियों से बङे राजा निपटते है।

- कमल की शादी किससे हुयी, मेहंदी से राजमणि से?
- राजमणि को ठकुराइन क्यों पसंद नहीं करती थी?
- मेहंदी को बङे राजा क्यों पसंद नहीं करते?
- टाॅमसन ने गाँव में धार्मिक विद्वेष क्यों फैलाया?
- क्यों हो गया गांव बेरोजगार?
- बङे राजा इन सब परिस्थितियों से कैसे निपट सके?
यह सब इस रोचक उपन्यास में उपस्थित है।

उपन्यास के पात्र-
   उपन्यास में पात्रों का परिचय।
1. मेहंदी- मेहंदी उस अल्हङ युवती का नाम है, जो करमपुर के ग्वाले देवी चौधरी की एकमात्र बेटी है।(पृष्ठ-01)
2. देवी चौधरी- मेहंदी का पिता।
3. राजा चन्द्रकिशोर नारायण सिंह- करमपुर गांव का प्रमुख।
4. कमल किशोर नारायण सिंह- चन्द्र किशोर का पुत्र
5. ठकुराइन नीलमुखी- कमल की माँ।
6.
7. कल्लन मियाँ- गांव के एक धार्मिक व्यक्ति।
8. ठाकुर जगदीश- अमिलहा गांव के प्रमुख
9. गोपाल- जगदीश का पुत्र।
10. राजमणि- जगदीश की पुत्री और कमल की प्रेयसी।
11. ठाकुर विजय बहादुर सिंह-  अमिलहा गांव का पूर्व प्रमुख।
12. जंगी- जगदीश का साथी। खलनायक ।
13. शिवप्रसाद- भजनपुर गांव का पटवारी।
14. टामसन- एक अंग्रेज व्यापारी।
अन्य पात्र- मुनीम, कारिंदा, लठैत, किसान, ग्रामीण आदि।

संवाद-
  उपन्यास के संवाद अच्छे और सूक्तिनुमा हैं। संवाद पात्रों की स्थिति का भी अच्छा चित्रण करने में सक्षम हैं।
- स्वार्थपरायणता स्त्री के लिए कलंक है और त्याग ही स्त्री का आभूषण है।(पृष्ठ-08)
- प्रेम का स्तर, सामाजिक बंधन के बांधे नहीं बंध सकता। (पृष्ठ-19)
- स्वतंत्रता अनुभवी के लिए वरदान है और नादान के लिए अभिशाप। (पृष्ठ-20)
- औरतों पर कुदृष्टि डालने वाले, पशु से  भी निकृष्ट होते हैं। (पृष्ठ- 95)
- शुद्रप्रेम का क्षणिक तूफान इतना तीव्रतर होता है कि मनुष्य अपने को सम्हाल ही नहीं सकता। (पृष्ठ-89)
- पवित्र प्रेम में उपासना की भावना रहती है, विद्वेष की नहीं....। (पृष्ठ-123)
- पुरुष हमेशा स्त्री को छलते आये हैं भँवरे....(पृष्ठ-202)
- स्त्री के हृदय की ममता पुरुष नहीं समझ सकता‌। (पृष्ठ-125)

उपन्यास में जहाँ एक तरफ बङे ठाकुर जैसे सज्जन व्यक्ति हैं तो वहीं जंगी जैसे शैतान भी। जो स्पष्ट कहते हैं- - विश्वासघात हमारा पेशा है ठकुराइन। (पृष्ठ-150)

- उपन्यास में तात्कालिक परिस्थितियों का अच्छा चित्रण है। भारत की दुर्दशा का चित्रण टामसन नामक अंग्रेज के माध्यम से दर्शाया गया है। कैसे एक व्यापारी बन कर अंग्रेज भारत आये और भारत को लूटा। इसका समाधान भी उपन्यास में है। वह समाधान है गांधी जी का सहयोग आंदोलन।
     याद रखो ! इन अंग्रेजों को मार भगाने का सबसे सरल उपाय असहयोग है। (पृष्ठ-199)
    
वर्तमान में बढते धार्मिक उन्माद को एक ही शब्द से स्पष्ट कर दिया- आधुनिक धार्मिकता(पृष्ठ12)।
आधुनिक धार्मिकता कितनी खतरनाक है। यह भी उपन्यास में दर्शाया गया है।

उपन्यास में एक- दो जगह शाब्दिक गलतियाँ नजर आयी।
- कमल के मुख से अपना नाम सुन कर, राजमणि के नेत्र हलाहल से भर उठे। (पृष्ठ-59)
यह एक प्रेम प्रसंग के दौरान का वाक्य है। हलाहल शब्द का अर्थ जहर होता है। अब प्रेम के दौरान नेत्र जहर से कैसे भर गये।

- किसी दिन! आधी रात के समय. (पृष्ठ-134)
  जब वर्णन आधी रात का है तो किसी दिन शब्द उपयुक्त नहीं लगता।

                   कुशवाहा कांत का प्रस्तुत उपन्यास भंवरा मूलतः एक प्रेम कथा है। यह प्रेम कथा होने के साथ -साथ समाज में बढती धार्मिक कट्टरता, अंग्रेजी शासन, अंग्रेजी शासन से उपजी बेरोजगारी का भी चित्रण करता है।
    उपन्यास रोचक और पठनीय है।

  उपन्यास में एक विरह गीत है।

प्रीति की ज्योति जला कर चुप हैं।
मन में आग लगा कर चुप हैं।
                           नैनन नीर बहा कर चुप हैं।
                           रोकर चुप, मुसका कर चुप हैं।
एक तमाशा नित होता है।
हम हँसते हैं, चित रोता है।
                           घर में आग लगा कर चुप हैं।
                           रो कर चुप, मुसका कर चुप हैं।
निर्मोही को मीत बनाया,
दिल में यह तूफान बसाया।
                          अपना आप लुटाकर चुप हैं।
                          मधुकर हूक दबा कर चुप हैं।

-----------------
इस उपन्यास को 17.07.1978 में भी किसी ने पहले पढा है। ऐसा विवरण उपन्यास में दिनांक सहित मिलता है।
उपन्यास उपलब्ध है- सरस्वती पुस्तकालय।
राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय- माउंट आबू- सिरोही, राजस्थान।

- - - - - - - - -  - - -‌‌ - - - - - - - - - - - - - - - -‌ - -
उपन्यास- भंवरा
लेखक- कुशवाहा कांत
पृष्ठ-220
प्रकाशक- चौधरी एण्ड संस, बनारस

      
  

Friday, 12 January 2018

94. आहुति- कुशवाहा कांत

सम्राट अशोक के जीवन का दूसरा पक्ष.
कुणाल के अंधे होने की कथा।

आहुति- कुशवाहा कांत, उपन्यास, रोचक, पठनीय, उत्तम।
------------------------------

कुशवाहा कांत का मेरे द्वारा पढा जाने वाला यह प्रथम उपन्यास है। मैं हमेशा सोचता था की इनके उपन्यास वही पारम्परिक सामाजिक कथानक वाले होंगे। लेकिन कुछ तात्कालिक पाठकों से सुना की कुशवाहा कांत के उपन्यास बहुत अच्छे होते हैं। तब मैंने कुशवाहा कांत के बारे में जानकारी एकत्र करनी आरम्भ की।
  कुशवाहा कांत ने कुल 35 उपन्यास लिखे हैं, जो की क्रांतिकारी, ऐतिहासिक, सामाजिक व श्रृंगारिक श्रेणी के हैं।
  मेरे विद्यालय ( राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय-माउंट आबू, सिरोही, राजस्थान) के पुस्तकालय में से कुशवाहा कांत के पांच उपन्यास उपलब्ध हुये और पांच-सात उपन्यास में कुछ विक्रेताओं से खरीदे।

    प्रस्तुत उपन्यास 'आहुति' सम्राट अशोक के जीवन का एक काल्पनिक रूप प्रस्तुत करता है जो पाठक को आरम्भ से अंत तक आबद्ध रखता है।
सम्राट अशोक के पुत्र के अंधे होने की कथा काफी प्रचलित है, अब सत्यता क्या है, कुछ कहा नहीं जा सकता।  कुछ ग्रंथों में इस कहानी को पूर्णतः काल्पनिक बताया गया है।
  
         सम्राट अशोक के पुत्र कुणाल को लेकर इस कहानी का एक काल्पनिक विस्तार किया गया है जो काफी रोचक है।
       एक थी तिष्यरक्षिता।
पाटलिपुत्र राज्यप्रसाद की प्रधान परिचारिका। उसके मादक सौन्दर्य ने, मगधपति, प्रियदर्शी सम्राट अशोकवर्धन के हृदय पर अमिट छाप अंकित कर दी थी और सम्राट अशोक, पचास वर्ष की ढलती उम्र में भी, उस सुंदरी परिचारिका पर आशक्त हो गये थे। (पृष्ठ-03(प्रथम)
            सम्राट उसे परिचारिका नहीं मानते थे। वे तो कहते थे- "तुम परिचारिका नहीं हो तिष्ये...तुम मेरे हृदय की उन्मादकारिणी ज्वाला हो।" (पृष्ठ-05)
  
  
   वृद्धावस्था की ओर सम्राट और युवा तिष्यरक्षिता का प्रेम आंतरिक न था।
           सन् 242 ईस्वी पूर्व जब बौद्ध धर्म की द्वितीय बौद्ध महासभा का आयोजन होने वाला था तब सम्राट अशोक ने अपनी संतान को भी आमंत्रित किया।।
मौर्यकुल भूषण धर्मविवर्धन युवराज कुणाल देव भी उपस्थित हुये।  जब युवा कुणाल को तिष्यरक्षिता ने देखा तो वह उस पर आशक्त हो गयी। तिष्यरक्षिता युवराज का सौन्दर्य देख कर विस्मृत सी हो उठी थी। (पृष्ठ-11) और वह कुणाल को स्पष्ट कहती है- कैसे बताऊं तुम्हें युवराज.....कि मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती। (पृष्ठ-57)
             यही सौन्दर्य कुणाल के विनाश का कारण बन गया। तिष्यरक्षिता माता-पुत्र का रिश्ता भूल कर कुणाल पर मोहित हो उठी। लेकिन कुणाल के हृदय में माता के प्रति आदर भाव ही रहा और वह तिष्यरक्षिता के प्रेम प्रस्ताव को अस्वीकार कर देता है।
        आजकल तिष्यरक्षिता के हृदय में युवराज कुणाल के प्रति प्रबल घृणा उत्पन्न हो गयी थी। अपना उबलता हुआ प्रेम ठुकरा दिये जाने पर तो वह युवराज पर क्रोधित थी ही, इधर एक बात और उसके हृदय को उद्वेलित कर रही थी।
   वह यह कि युवराज कुणाल के जीवित रहते, उसका पुत्र सम्राट कैसे बनेगा? (पृष्ठ-89)

कुणाल की पत्नी कांचन का उपन्यास के मध्यांतर के पश्चात एक सशक्त वीर नारी का रूप उभर कर सामने आता है। वह अपने पति के साथ हुए अन्याय का विरोध करती है- मैं अपने पति के साथ किये गये अन्याय के लिए एक बार प्रलय तक मचा दूँगी....।(पृष्ठ-131) और वह इस बात को साबित भी कर देती है। एक पतिव्रता स्त्री जब क्षत्राणी रूप धारण करती है वह कितनी कठोर हो जाती है।

     कुणाल जहाँ एक वीर योद्धा और न्यायप्रिय व्यक्तित्व का धनी है वहीं वह माता-पिता का सचा आज्ञाकारी भी है। जब सम्राट अशोक का नकली आज्ञा पत्र उसे प्राप्त होता तब भी वह उसकी सत्यता न जांच कर अपनी आहुति दे देता है।
     कुणाल को पता है की तिष्यरक्षिता उसकी जान की दुश्मन है पर वह फिर भी उसके हृदय में तिष्यरक्षिता के प्रति आदर भाव कम नहीं होता।
"आज मैं तुम्हारे रक्त की प्यासी हूँ कुणाल....।"
" यदि माता की प्यास बुझ सके, तो पुत्र अपना रक्त देने को प्रस्तुत है।" (पृष्ठ- 188)
   
     
उपन्यास में धर्म चर्चा भी नये दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है।
"तो जन्म धारण करने से पहले मनुष्य क्या था महात्मन?"- किसी ने पूछा।
" वीर्य श्रोत में एक कीट के रूप में विद्यमान था"- महात्मा यश ने उत्तर दिया, "उस वीर्य कीट ने गर्भ में जाकर जीवात्मा का रूप धारण किया और समय आने पर मनुष्य के रूप में अवतरित हुआ...अब प्रश्न उठता है इस वीर्य कीट की उत्पत्ति कैसे और किससे हुई?................।" (पृष्ठ-167)
    इस प्रश्न का उत्तर तो उपन्यास पढकर ही मिल सकता है।
   उपन्यास में धर्म- अधर्म और एक सच्चे भिक्षु का कर्तव्य भी वर्णित है।
             "वत्स!....महात्मा यश ने कहा- "न्याय धर्म है और अन्याय अधर्म है....न्याय पुण्य है और अन्याय पाप....प्रत्येक भिक्षु का कर्तव्य है कि वह धर्म को प्रोत्साहन दे और अधर्म को दूर करे...पुण्य का प्रसार करे और पाप भावना को भस्मीभूत करके अंत:करण को स्वच्छ रखे.....।" (पृष्ठ- 173)

संवाद-
           किसी भी कहानी के संवाद उसकी जान होते हैं। संवाद ही पात्र के विचार-भाव प्रकट करते हैं और संवाद ही कथा को आगे बढाने में सहायक होते हैं।
       आहुति उपन्यास के संवाद कथा अनुरुप ही हैं।
उदाहरण
स्त्री के हृदय में वासना का नृत्य अत्यंत भयंकर होता है। (पृष्ठ-63)

भाषा शैली-
             उपन्यास की भाषा की बात करें तो यह हिंदी लिखित है पर संस्कृतनिष्ठ शब्दावली का प्रयोग किया गया है।  कहानी बौद्ध धर्म से संबंधित है और उस समय की भाषा पाली थी। लेकिन पाली भाषा का जन्म भी संस्कृत से ही हुआ है।
          उस समय की भाषा शैली दिखाने की दृष्टि से संस्कृतनिष्ठ शब्दावली का प्रयोग उचित ही है।

पात्र-
       उपन्यास के प्रमुख पात्रों का संक्षिप्त परिचय।

अशोक-          पाटलिपुत्र का सम्राट।
असंधिमित्रा-   सम्राट अशोक की रानी।
तिष्यरक्षिता-   अशोक की परिचारिका, रानी।
कुणाल-          अशोक का पुत्र, वीर योद्धा।
कांचन-           कुणाल की पत्नी, वीर नारी।
संप्रति-           कुणाल का पुत्र।
महेन्द्र-            अशोक का पुत्र, धर्मप्रचारक।
संघमित्रा-       अशोल की पुत्री, धर्मप्रचारक।
दशरथ-          अशोक का पुत्र.
यश-               धर्मगुरु।
त्र्यम्बक शास्त्री- राज वैद्य/ भिषग्शिरोमणि।
आमात्य श्रेष्ठ-
तक्षशिलाधीश
गोपक चन्द्रभाल- तक्षशिला का विद्रोही, कुणाल का मित्र।
रुद्रसेन-               तिष्यरक्षिता का विश्वस्त सहायक।
       इनके अतिरिक्त भी उपन्यास में अन्य पात्र उपस्थित हैं।

           छल-फरेब, धोखा-षड्यंत्र, प्रेम-प्रतिशोध की पृष्ठभूमि पर रचा गया यह उपन्यास पाठक के अंत:करण में स्थापित होने में सक्षम है।
    कुशवाहा कांत की लेखनी की यह एक एक विशिष्ट रचना है।
     उपन्यास का समापन इतना भयानक है की उसे शब्दों में वर्णित करना भी असंभव सा लगता है।
स्वयं भिक्षु कुणाल भी उस दौरान वहाँ रुकने में असमर्थ हो गये। " मैं यहाँ नहीं रह सकता...नहीं रह सकता।"- कहते हुए पागल से युवराज कुणाल सभाभवन से भाग खङे हुए।

निष्कर्ष-
              पाटलिपुत्र सम्राट अशोक के पुत्र कुणाल के जीवन के एक प्रसंग को आधार बना कर लिखा गया यह उपन्यास वास्तव में रोचक और पठनीय है।  हालांकि कहानी की सत्यता पर कुछ कहा नहीं जा सकता पर कहानी का प्रस्तुतिकरण सार्थक रहा है।
         अगर कहानी को पूर्णतः काल्पनिक भी मान लिया जाये तो भी कहानी की सार्थकता यथावत रहेगी।
      मनोरंजन और इतिहास, सत्य और कल्पना का अद्भुत मिश्रण पाठक को इस उपन्यास में मिलता है।
     पाठक को किसी भी स्तर पर उपन्यास निराश नहीं करेगा।
  मेरी व्यक्तिगत राय से यह उपन्यास पठनीय है ।
अगर आप कुछ अलग हटकर और सार्थक पढना चाहते हैं तो कुशवाहा कांत का उपन्यास आहुति अवश्य पढें।

-------------
उपन्यास- आहुति
लेखक- कुशवाहा कांत
पृष्ठ- 222