Friday, 6 April 2018

109. काजर की कोठरी- देवकीनंदन खत्री

जब शादी के दिन गायब हो गयी पत्नी...
काजर की कोठरी- देवकीनंदन खत्री, थ्रिलर, औसत।
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संध्या होने में अभी दो घण्टे की देर है मगर सूर्य भगवान के दर्शन नहीं हो रहे, क्योंकि काली-काली घटाओं ने आसमान को चारों तरफ से घेर लिया है। जिधर निगाह दौङाइए मजेदार समा नजर आता है और इसका तो विश्वास भी नहीं होता कि संध्या होने में अभी कुछ कसर है।
                यह पंक्तियां देवकीनंदन खत्री जी के प्रसिद्ध उपन्यास 'काजर की कोठरी' की हैं।
अय्यारी, तिलस्मी जैसे उपन्यासों में महारथ हासिल खत्री का यह उपन्यास उनके अन्य उपन्यासों से थोङा सा अलग है क्योंकि इसमें तिलिस्म या अय्यारी नहीं बल्कि धोखेबाजी मुख्य है। पाठक को प्रथम पृष्ठ से ही सब कुछ पता चल जाता है की उपन्यास का अंत क्या होगा।
    
       जिमींदार कल्याण सिंह के पुत्र हरनंदन की शादी लाल सिंह की पुत्री सरला से होने वाली है। शादी के दिन सरला घर से गायब पायी जाती है। उसके कमरे में खून के छींटे मिलते हैं।
                दूसरी तरफ कल्याण सिंह के कमरे में एक पिटारा मिलता है जिसमें खून से सने वे कपङे होते हैं जो कल्याण सिंह के परिवार की तरफ से सरला को रस्म अनुसार दिये गये थे।
                     दोनों परिवार हैरान-परेशान और दुखी हैं कि आखिर सरला कहां गायब हो गयी।
आखिर हरनंदन सिंह सरला के गायब होने ले रहस्य को सुलझाने का निर्णय लेता है।

- सरला आखिर कहां गायब हुयी?
- क्या सरला जिंदा/ मुर्दा थी?
- कौन थे अपराधी?
- क्या हरनंदन सिंह अपने कार्य में सफल हुआ?
- खून से सने कपङों‌ का क्या रहस्य था?
    ऐसे एक नहीं अनेक प्रश्नों का उत्तर तो देवकीनंदन खत्री के उपन्यास काजर की कोठरी को पढकर ही मिल सकते हैं।
      
    उपन्यास सामान्य है। पाठक को उपन्यास के आरम्भ में ही मूल कथा और खलनायक का पता चल जाता है।  शेष उपन्यास में मात्र यही रहस्य बाकी रह जाता है की हरनंदन सिंह कैसे सरला का पता लगता है।

संपादक महोदय ने उपन्यास के आरम्भ में ही इतना कुछ लिख दिया की उपन्यास बिना पढे भी काम चल सकता है। आप भी पढ लीजिएगा।
   काजर की कोठरी सन् 1900 के आसपास लिखा गया उपन्यास है जिसमें वेश्या सरीखी, दुष्चरित्र, धोखेबाज और कुटिल समझी जाने वाली स्त्री के चरित्र का औदात्य दिखाया गया है। जमींदार और वेश्या के आत्मीय, सरल और सहज संबंधों को इस उपन्यास में वाणी दी गयी है।
            यह उपन्यास मूलतः वेश्या जीवन पर लिखा गया है। जमींदार हरनंदन सिंह का विवाह सरला के साथ होने वाला है। किंतु वह विवाह पूर्व ही गायब कर दी जाती है- गायब होने के स्थान पर खून से सनी एक पोटली मिलती है। हरनंदन सिंह शादी में आयी वेश्या से संबंध स्थापित कर लेते है और गायब हुयी सरला का पता लगाते हैं। सरला का चचेरा भाई उसका विवाह हरनंदन सिंह के साथ नहीं करना चाहता- बल्कि चाचा की वसीयत के अनुसार उसका विवाह कहीं अन्यत्र करा, वह आधे धन का मालिक बनना चाहता है। हरनंदन सिंह वेश्या को अपने विश्वास में लेकर अंत में सरला का पता लगा लेते हैं और अपराधी दण्डित होते हैं।
 
    उपन्यास में विशेष तौर से वेश्या जीवन के दोहरे चरित्र का खूब वर्णन किया है।
 
उपन्यास कोई विशेष नहीं है। मात्र देवकीनंदन खत्री का उपन्यास होने के नाते या वेश्या जीवन के दोहरे चरित्र को देखने की दृष्टि से पढा जा सकता है।

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उपन्यास- काजर की कोठरी
लेखक-    देवकीनंदन खत्री (18.06.1861- 04..8.1913)
वर्ष- 1900 (लगभग)
प्रकाशक- साहित्यागार, SMS हाइवे -जयपुर
पृष्ठ- 83

Thursday, 5 April 2018

108. सूरज का सातवाँ घोङा- धर्मवीर भारती

टुकङो में विभक्त एक दर्द भरी प्रेम कहानी।
सूरज का सातवाँ घोङा- धर्मवीर भारती, साहित्यिक उपन्यास, रोचक, पठनीय, उत्तम।
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    धर्मवीर भारती द्वारा लिखा गया उपन्यास सूरज का सातवाँ घोङा एक प्रयोगात्मक उपन्यास है। कथा और शिल्प दोनों स्तरों पर इसमें अपने समय में प्रयोग किये गये थे। यह प्रयोग सफल भी रहा। क्योंकि सन् ..में प्रकाशित इस उपन्यास को आज भी पाठक उतने ही चाव से पढता है जितना इसके प्रकाशन के वक्त पढा गया था।
      निर्देशन श्याम बेनेगल द्वारा इस उपन्यास पर इसी शीर्षक से निर्मित फिल्म सफल भी रही और उसे राष्ट्रीय...पुरस्कार भी प्राप्त हुआ।
     
       सूरज का सातवाँ घोङा एक प्रेम कथा है। यह एक कहानी है या उपन्यास ऐसा पाठक को लग सकता है । मूलतः यह उपन्यास है लेकिन इसके प्रस्तुतीकरण का तरीका कहानी जैसा ही है। यह स्वयं में एक प्रयोग है।
     पूरा घटनाक्रम माणिक मुल्ला के कथित है।

गर्मि का समय है, दोपहर का। कुछ बच्चे माणिक मुल्ला के कमरें में हर रोज एकत्र होते हैं और माणिक मुल्तान उन्हें हर रोज एक प्रेम कहानी सुनाता है। ये कहानियाँ प्रथम दृष्टया अलग -अलग नजर आती है लेकिन अंत में जाकर एक हो जाती हैं। लेकिन किसी भी कहानी में कॊई बिखराव नहीं है। सभी एक दूसरे से आबद्ध है। इन सभी कहानियाँ को आपस में आबद्ध करने का कार्य स्वयं माणिक मुल्ला ही करता है क्योंकि वह प्रत्येक कहानी से स्वयं भी जुङा हुआ है।
         
    कहानी चाहे जमुना की हो, चाहे लिली या सती की। सभी से माणिक मुल्ला का संबंध रहा है और सभी कहानियाँ में एक टीस भी है। एक ऐसी टीस जो पाठक के हृदय को चीर जाती है। 
        
      उपन्यास में माणिक मुल्ला के माध्यम से क ई कहानियों व्यक्त हुयी हैं लेकिन कोई भी प्रेम कहानी अपने लक्ष्य तक न पहुंची। यही जीवन की विडंबना है और इसी विडंबना को विभिन्न पात्रों के माध्यम से व्यक्त किया गया है।
            जमुना को तन्ना बहुत पसंद है, वह उससे शादी की इच्छुक है। लेकिन समाज की मर्यादा इस प्रेम में बाधक है। तन्ना का बाप महेसर भी इस प्रेम को स्वीकृति नहीं दे पाता। जमुना माणिक मुल्ला के प्रति भी बहुत लगाव रखती है लेकिन इसका प्रेम कहीं भी सफलता प्राप्त नहीं कर पाता।
        एक है लिली उर्फ लीला जो माणिक मुल्ला से स्नेह रखती है। लेकिन आधुनिक विचारों की समर्थक है। लीला का विवाह तन्ना से हो जाता है। लेकिन एक बच्चे के पश्चात भी दोनों में दाम्पत्य प्रेम की कमी दिखाई देती है।
         सती जो की एक आत्मनिर्भर महिला की भूमिका में है लेकिन उसकी पारिवारिक स्थिति उसे इस स्थिति में‌ ले आती है जहाँ वह न जी सकती है न‌ मर सकती है। सती और माणिक मुल्ला में स्नेह की डोर है। लेकिन परिस्थितिया इस डोर को तोङ देती हैं।  दूसरी तरफ तन्ना का बाप महेसर सती की आर्थिक व पारिवारिक परिस्थितियों का भरपूर फायदा उठाने की सोचता है।
     
एक तरह से सभी कहानियाँ माणिक मुल्ला से संबंध रखती हैं और अपना स्वतंत्र अस्तित्व भी।

इस उपन्यास में मात्र प्रेम कहानियाँ ही नहीं है, इनके साथ-साथ भारत के मध्यवर्गीय समाज का चित्रण, प्रेम की पीर, मार्क्सवाद और आधुनिक कहानी के संबंध में भी बहुत कुछ पढने को मिलता है।
  
        आजकल के लेखक जिस प्रकार कहानी के शीर्षक को अति आकर्षक बनाने में लगे रहतॆ हैं उस पर माणिक मुल्ला के माध्यम से व्यंग्य किया गया है- "...तुम लोग कहानी सुनने आये हो या शीर्षक सुनने? या मैं उन कहानी लेखकों में से हूँ जो आकर्षक विषयवस्तु के अभाव में आकर्षक शीर्षक देकर पत्रों के संपादकों और पाठकों का ध्यान खींचा करते हैं।" (पृष्ठ-43)
"टेकनीक पर ज्यादा जोर वही देता है जो कहीं न कहीं अपरिपक्व है...फिर भी टेकनीक पर ध्यान देना बहुत स्वस्थ प्रवृत्ति है बशर्ते वह अनुपात से अधिक न हो।" (पृष्ठ-84)
     
मध्यमवर्गीय समाज के संबंध में लिखा है- " हम‌ सभी निम्न मध्य श्रेणी के लोगों की जिंदगी में हवा का ताजा झोंका नहीं है...।"(पृष्ठ-42)

कुछ विशेष कथन-
- प्यार आत्मा की गहराइयों में सोये हुए सौन्दर्य के संगीत को जगा देता है। (पृष्ठ-69)

उपन्यास खण्ड और शीर्षक-
उपन्यास को सात खण्डों में विभक्त किया गया है।  प्रत्येक खण्ड का नाम‌ दोपहर दिया गया है, क्योंकि यह कहानियाँ गर्मी की दोपहर में सुनायी गयी हैं। हिंदी साहित्य में विभिन्न ग्रंथों में खण्डों के नाम अलग-अलग मिलते हैं, जैसे समय( पद्मावत में), अंक, भाग, इत्यादि।
    प्रत्येक खण्ड से पूर्व एक छोटा सा अध्याय भी अनध्याय नाम से मिलता है।

निष्कर्ष-
  धर्मवीर भारती द्वारा लिखा गया उपन्यास सूरज का सातवाँ घोङा एक प्रयोगशील उपन्यास है।
कथा स्तर पर यह उपन्यास मानव के अंतर का चित्रण करता है। यह उस मध्यमवर्गीय समाज का चित्रण करता है जो करना कुछ और चाहता है लेकिन उसकी परिस्थितियां उसे करने नहीं देती। ऐसी ही विषम परिस्थितियों में घिरे माणिक मुल्ला, जमुना, लिली, सती और तन्ना का चित्रण इस उपन्यास में मिलता है।
       कहानी रोचक और मन को छू लेने वाली है। उपन्यास का कलेवर लघु है और कहानी में तीव्रता भी है जो पाठक को स्वयं में समेटे रखती है।
      अगर आप यथार्थवादी प्रेम कहानी पढना पसंद करते हो तो यह उपन्यास अवश्य पढें ।

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उपन्यास- सूरज का सातवाँ घोङा
लेखक- धर्मवीर भारती
प्रकाशक-
वर्ष-
पृष्ठ- 114
मूल्य-

 इस उपन्यास को इस लिंक पर निशुल्क पढा जा सकता है।-  सूरज का सातवाँ घोङा

107. तीन इक्के- गुलशन नंदा

सुनहरे सपनों से दर्द तक तक सामाजिक कथा।

तीन इक्के- गुलशन नंदा, सामाजिक उपन्यास, रोचक, पठनीय।
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     साधना अभी काॅलेज से अपनी शिक्षा समाप्त करके निकली है। अन्य लङकियों की तरह उसके मन में भी नये सपने, नयी उमंग है। समाज को कुछ नया कर दिखाने की। अपनी प्रतिभा के दम पर एक नयी इबारत निकले की।
               लेकिन अभी साधना के सपनों ने उडान भी नहीं भरी थी की उसका सामना पडोसी आंटी ‌के घर दिल्ली से आये प्रकाश से हो जाता है। शायद मैं एक भेंट में प्रकाश पर छा जाना चाहती थी। ब्याह का संबंध हो या हो, मैं उसके मस्तिष्क पट पर एक ऐसा चित्र अंकित करना चाहती थी जो उसे सदा मेरी याद दिलाता रहे। (पृष्ठ-31)

मुलाकात से प्यार और प्यार से यह रिश्ता शादी तक पहुंच जाता है।
      
     दोनों परिवार आर्थिक और सामाजिक दृष्टिकोण से संपन्न हैं। साधना को एक नयी प्यार की दुनिया मिलती है। लेकिन यह स्वप्न कुछ समय पश्चात ही खण्डित हो जाते हैं जब उसके समक्ष प्रकाश का एक नया रूप आता है।
       साधना के दिव्यस्वप्न टूट जाते हैं। लेकिन साधना जैसी शिक्षित लङकी हार नहीं मानती वह परिस्थितियों को अपने पक्ष में करने की हर संभव कोशिश करती है।
  
         उपन्यास में मूलतः इस बात पर ध्यान केन्द्रित है की कैसे एक लङकी अपने संसार को बचाने की कोशिश करती है।
   
  उपन्यास समाज के कई पक्षों का सहज ही चित्रण कर डालता है। पाठक जैसे जैसे कहानी में आगे बढता है उसे समाज/ व्यक्ति के कई रूप नजर आते हैं।  यह हमारे समाज की वास्तविकता को भी रेखांकित नरता है।
- साधना  और उसकी सहेलियों का शिक्षा पश्चात अपने पैरों पर खङा होने की चर्चा लेकिन साधना के माध्यम से यह भी दर्शाया गया है कई बार शिक्षण के पश्चात सपने पूर्ण नहीं होते।
- लङकी की जल्द शादी की कोशिश करना।
- प्रकाश जैसे व्यक्ति जो किसी भी लङकी को बहला सकते हैं।
- साधना की आंटी जैसे औरत जो साधना को भी सत्यता नहीं बताती।
- मिस्टर कपूर जैसे दोहरे चरित्र के आदमी ।
लेकिन समाज में बुराई है तो अच्छाई भी है। इसका चित्रण कई व्यक्तियों के द्वारा किया गया है।
साधना- जो प्रत्येक परिस्थिति का सामान मजबूती से करती है।
जाॅनी ड्राइवर- सरल हृदय के व्यक्ति ।
प्रकाश के पिता- जो अपनी बहू को बेटी के समान मानते हैं।

      उपन्यास में समाज की कई  बुराईयों का भी चित्रण है।     आजकल सोशल पार्टी के नाम पर लोग असामाजिक कार्य करते हैं। इनका विरोध साधना के माध्यम से दर्शाया गया है।
"तुम इतना पढ-लिखकर भी इन सोशल पार्टियों को बुरा कहती हो।"
"वह पार्टी या सभा, जहाँ मानव अपना चरित्र खो दे, सोशल(Social) नहीं कहलाती।" (पृष्ठ-43)
 
उन लोगों का भी चित्रण उपन्यास में है जो पहले जो लाङ- प्यार में अपनी संतान का व्यवहार खराब कर लेते हैं और फिर पश्चात करते हैं।

मुझे आज भली प्रकार उनकी विवशता का ध्यान हया। लाङ और प्यार से वह अपने बेटे को बिगाङ तो चुके थे ही, अब उसे सुधारने के लिए वह उसे कोई कठोर शब्द भी न कह सकते थे। (पृष्ठ-64)

संवाद और भाषा शैली -
                                 उपन्यास एक सामान्य कथा है इसमें कोई विशेष प्रभावी संवाद का प्रयोग नहीं है। और न ही ऐसी कोई कथा की मांग दृष्टिगत होती है। फिर भी यह एक अच्छा उपन्यास है और इसकी भाषा शैली सहज और सरल है।
फिर भी दो उदाहरण उपन्यास के संपूर्ण वातावरण को चित्रित करने में सक्षम है।

"कभी-कभी अनजान राही ठोकर लगने पर  अपने मार्ग से विचलित हो जाते हैं।" (पृष्ठ-66)

"हर वह स्थान जहाँ आप मेरे संग हैं, मेरे लिए हनीमून का स्थान है, हर वह मार्ग धरती का टुकङा जहाँ क्षण भर भी आप रुककर बात करते हैं, मेरी ओर देखकर मुस्कुराते हैं, मेरे लिए पवित्र स्थान बन जाता है...और आपका हर श्वास जिसमें मेरी याद रची है, मेरे लिए मधुर गीत है....यही मेरा ऐश्वर्य है।"-(पृष्ठ- 68)

उपन्यास शीर्षक-     
                       उपन्यास का शीर्षक तीन इक्के क्यों है। यह मुझे समझ में नहीं आया। साधना और प्रकाश के अतिरिक्त अन्य कोई भी प्रभावी पात्र नहीं है। जिसके आधार पर उपन्यास का नाम ती‌न इक्के रखा जाये।
     हालांकि उपन्यास में दो जगह ताश के खेल में तीन इक्के अवश्य आते हैं। जहाँ हार जीत में समर्पण अवश्य होता है।
शायद यही आधार उपन्यास के नामकरण में होगा।

निष्कर्ष-
    ‌‌‌       गुलशन नंदा का उपन्यास तीन इक्के एक पारिवारिक रचना है जो पाठक को सहज ही आकृष्ट करती है। भारतीय समाज में जो सामान्य परिस्थितियाँ होती है उन्हीं पर यह उपन्यास आधारित है।
      उपन्यास पाठक को आरम्भ से अंत तक अपने में बांधे रखता है। रचना छोटी सी है, प्रवाह तीव्र है इसलिए पाठक कहीं भी मानसिक थकान महसूस नहीं करता।
      उपन्यास पठनीय और रोचक है। सामाजिक उपन्यासों के पाठकों के अलावा अन्य पाठकों को भी उपन्यास पसंद आयेगा।
धन्यवाद।
- गुरप्रीत सिंह
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उपन्यास- तीन इक्के
लेखक- गुलशन नंदा
प्रकाशक- अशोक पॉकेट बुक्स- दिल्ली
वर्ष- 
पृष्ठ-
मूल्य

Tuesday, 3 April 2018

106. गुनाह के फूल- गुलशन नंदा

जब गुनाह के फूल खिले.....
गुनाह के फूल- गुलशन‌ नंदा, मर्डर मिस्ट्री, रोचक, पठनीय।
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     गुलशन मूलतः एक सामाजिक उपन्यासकार हैं और अपने समय के सर्वाधिक चर्चित उपन्यास लेखक भी रहें हैं। इनके सामाजिक उपन्यासों पर बहुत सी चर्चित फिल्में भी बन चुकी हैं। 

            गुलशन नंदा का प्रस्तुत उपन्यास गुनाह के फूल एक‌ मर्डर मिस्ट्री है। मेरे विचार से ऐसा इनका यह एकमात्र उपन्यास ही होना चाहिए। घटना चाहे कोई भी हो वह समाज से विलग नहीं हो सकती, ठीक उसी तरह यह मर्डर मिस्ट्री भी समाज की ही एक घटना पर आधारित है। लेकिन लेखन ने इस पर समाजिकता हावी नहीं होने दी और इसी कारण से गुलशन नंदा का यह उपन्यास उनके अन्य सामाजिक उपन्यासों से अलग हटकर मर्डर मिस्ट्री की श्रेणी में आ जाता है।

        उपन्यास की कथा कोई ज्यादा बङी नहीं है और न ही पात्र ज्यादा हैं और ठीक उसी अनुपात में उपन्यास के पृष्ठ हैं। उपन्यास की कहानी, पात्र और पृष्ठ के अनुपात में उपन्यास रोचक और पठनीय बना है।
 
    क्रिसमस की छुट्टियों के दौरान सुशील अपने छोटे भाई नवीन के साथ मुंबई एक्सप्रेस से अपनी‌ जीजी से मिलने भोपाल जा रही थी । वह अकेली न थी, बल्कि उसका छोटा भाई नवीन भी उसके सामने वाली सीट पर बैठा था। नवीन का अकेले बहन के संग रेल में यात्रा करने का पहला अवसर था। सुशील काॅलेज में पढती थी और नवीन तीसरी कक्षा का विद्यार्थी था। दोनों क्रिस्मस की छुट्टियां काटने अपनी बङी बहन के पास भोपाल जा रहे थे। (पृष्ठ-03)  लेेकिन रास्ते में, ट्रेन में, रात के अंधेरे में किसी शैतान ने सुशील से दुराचार कर उसकी हत्या कर दी और उसके छोटे भाई को हाथ बांध कर टाॅयलेट में बंद कर दिया।
        सुशील का जीजा हरदयाल जो की भोपाल रेल्वे पुलिस का इंचार्ज था। वह इस केस की छानबीन करता है और एक मोङ पर जाकर वह स्वयं आश्चर्यचकित रह जाता है।  तस्वीर को ध्यान से देखते ही उसके मस्तिष्क पर एक अँधेरा सा छाने लगा। उसके हृदय की धङकने तेज हो गयी। टाँगें क्षण भर के लिए लङखङा सी गयी। पाँव तले की धरती खिसकती हुयी दिखाई देने लगी। उसे विश्वास न आ रहा था कि यह तस्वीर उस अपराधी की है...कहीं बहुत बङी भूल तो नहीं हो गयी.....कठिनता से अपने आपको सँभालते हुए वह पास के बिछे हुए बैंच पर बेसुध सा बैठ गया। (पृष्ठ-75) लेकिन अंतत: वह अपराधी को पकङने में कामयाब होता है।
            उपन्यास की‌ कहानी हालांकि छोटी सी है। एक हत्या और फिर मुजरिम को पकङना लेकिन उपन्यास में विशेष है इस दौरान की छोटी-छोटी घटनाएं । छोटे-छोटे तथ्यों और सबूतों के आधार पर कैसे एक पुलिसकर्मी अपराधी तक पहुंच पाता है। उपन्यास में कुछ ट्विस्ट भी हैं जो स्वयं हरदयाल को भी विचलित कर देते हैं। लेकिन एक कर्तव्यनिष्ठ, ईमानदार हरदयाल अपने कर्तव्य से विचलित नहीं होता।
     
                 गुलशन नंदा का उपन्यास पढना स्वयं में एक रोचकता है, और वह भी जब मर्डर मिस्ट्री हो तो क्या कहना। उपन्यास में कहीं भी अनावश्यक वार्तालाप, दृश्य नहीं है। उपन्यास बहुत ही हल्का-फुल्का है। अन्य जासूसी या मर्डर मिस्ट्री उपन्यासों की तरह उलझा हुआ नहीं है। यही उपन्यास की विशेषता है।
         उपन्यास पूर्णतः पठनीय है। अगर आप कम समय के लिए कोई रोचक उपन्यास पढना चाहो तो यह उपन्यास अवश्य पढें इसमें पाठक को कहीं भी अनावश्यक दिमाग लगाने की आवश्यकता नहीं है। उपन्यास का धीमा प्रवाह पाठक को अपने साथ धीरे-धीरे बहा ले चलता है।
       एक सामाजिक उपन्यासकार का मर्डर मिस्ट्री उपन्यास पढना स्वयं में रोचक है।
उपन्यास पठनीय है।
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उपन्यास -    गुनाह के फूल
लेखक-       गुलशन नंदा
प्रकाशक-    अशोक पॉकेट बुक्स- 4/36, रूपनगर, दिल्ली
पृष्ठ-          109

Monday, 12 March 2018

103. दस बजकर दस मिनट- अरुण सागर

कत्ल की अनोखी साजिश
दस बजकर दस मिनट- अरुण सागर, जासूसी उपन्यास, मर्डर मिस्ट्री, पठनीय।
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विनोद कपूर राजधानी दिल्ली का नंबर वन गार्डन डिजायनर था। (पृष्ठ-07) और उसकी‌ पत्नी किरण कपूर एक प्रसिद्ध जासूसी उपन्यासकार। किरण के पास कोई अज्ञात एस. एस. नामक आदमी प्रेम पत्र भेजता है और कभी उसे जान से मारने की धमकी देता।
          विनोद कपूर इस समस्या का हल  ढूंढने के लिए क्राइम एक्सपर्ट सूरज खन्ना की मदद लेता है। जासूस- क्राइम एक्सपर्ट सूरज खन्ना जब विनोद कपूर की कोठी पहुंचता तब दस बजकर दस मिनट पर किरण कपूर की हत्या हो जाती है।
                                  सूरज खन्ना अभी इस मर्डर मिस्ट्री का हल नहीं ढूंढ पाता उधर सिरफिरा कातिल और भी कत्ल कर देता है।

          यह मर्डर मिस्ट्री बहुत उलझी हुयी है। जासूस सूरज खन्ना के लिए एक चुनौती है की कातिल उसकी उपस्थिति में कत्ल कर गया और उसे पता तक न चला और कत्ल भी इस अंदाज से की‌ पाठक चौंक जाये।
लेखक अपने लेखकिय में लिखता है - अपने प्रथम उपन्यास दस बजकर दस मिनट में मैं‌ मर्डर का एक ऐसा तरीका दिखा रहा हूं जो आपने तो किसी से सुना होगा और कहीं पढा होगा। इस उपन्यास में किरण कपूर का कत्ल तो गोली से, जहर से और किसी अन्य तरीके से हुआ। (लेखकीय पृष्ठ से) और वास्तव में लेखक ने यहाँ एक नया प्रयोजन किया है। यह प्रयोग क्या है यह तो बस उपन्यास पढकर ही जाना जा सकता है।
 
    उपन्यास का आरम्भ बहुत ही रोचक ढंग से होता है। उपन्यास के आरम्भिक पृष्ठ ही पाठक को स्वयं में कैद करने में इतने सक्षम हैं की पाठक पूरा उपन्यास पढता चला जाता है।
कुछ रोचकता देखिएगा।
- किरण कपूर अपने विशेष मित्र सुरेश साहनी से अक्सर मिलती है।
- विनोद कपूर को किरण कपूर और सुरेश साहनी पर संदेश है।
- विनोद कपूर अपनी पर्सनल सक्रेटरी ज्योति पाठक को पसंद करता है।
- ज्योति पाठक एक अन्य युवक को पसंद करती है।
- वह अन्य युवक किरण कपूर को इमोशल ब्लैकमेल करता है।
- एक है डबल एस. (एस.एस.) जो किरण कपूर को एक तरफा प्यार करता है।
- एक है स्वीटी जो किरण को बचपन से ही प्यार करता है।
- सुरेश साहनी भी किरण को चाहता है और विनोद कपूर तो सुरेश साहनी से नफरत करता है।

          
 
उपन्यास में ऐसे कई रोचक प्रसंग हैं जो उपन्यास को रोचक बनाने में पूर्णतः सक्षम है।

            उपन्यास में रोचक प्रसंग ही नहीं बल्कि रोचक पात्र भी है। एक पात्र है स्वीटी और दूसरा पात्र है प्राणनाथ कपूर।
                        स्वीटी का उपन्यास में जब भी आगमन होता है वह हर बार एक नया रहस्य पैदा कर जाता है। कभी वह पागल लगता है, कभी प्रेमी, कभी हत्यारा और कभी सनकी। और एक बात और बात भी ये की वो बात भी बहुत करता है।

उसने में प्राणनाथ खूब चर्चा में रहता है लेकिन उपन्यास  अंतिम चरण में उसका चरित्र पाठक के समक्ष आता है। और जब वह सामने आता है तो स्वयं सूरज खन्ना के मुँह से एक ही बात निकलती है-  बाहर आकर उसने पांच मिनट तक गहरी- गहरी साँस ली और फिर बुदबुदा उठा- "क्या कैरेक्टर था यार।" (पृष्ठ209)

      उपन्यास के पात्र दमदार हैं तो कुछ संवाद भी पठनीय है।

" ....फिर भी औरत, औरत होती है और वो हमेशा पूजा के काबिल होती है।"(पृष्ठ-200)

" बुजदिल बार-बार मरते हैं। मौत से डरने वाला भला जिंदगी का आनंद क्या जाने।"(पृष्ठ-222)

गलतियाँ-
              किसी भी रचना में लेखक या मुद्रण के दौरान कुछ गलतियाँ रह जाना स्वाभाविक है। प्रस्तुत उपन्यास में एक दो जगह शाब्दिक गलतियाँ है। लेकिन ये गलतियाँ उपन्यास के प्रवाह को बाधित नहीं करती।
- जैसा हर फिल्म में शाहरुख खान का कैरेक्टर दिखाया गया था। (पृष्ठ-39)
   यहाँ हर की जगह डर शब्द आना था।

- "क्या नाम है उसका?"
  "किरण कौल"
  "ओह! तो किरण कपूर आपकी वाइफ है..।"(पृष्ठ-40)
यहाँ पहले किरण कौल लिखा और फिर किरण कपूर जबकि सही नाम किरण कपूर ही है‌।

- "विनोद भैया के डैडी। प्राणनाथ ....." कौल।..."(पृष्ठ-123)
यहाँ प्राणनाथ कपूर नाम आना था।
     उपन्यास के कुछ पृष्ठ इतने धुंधले हैं की पढने में भी परेशानी का सामना करना पङा।

   निष्कर्ष-        
                अरुण सागर का प्रस्तुत उपन्यास 'दस बजकर दस मिनट' एक जबरदस्त मर्डर मिस्ट्री है। जो की आरम्भ से अंत तक पाठक का भरपूर मनोरंजन करेगी, कातिल भी पाठक की आँखों के सामने होगा पर पाठक वहाँ तक पहुंच नहीं पायेगा और जब क्राइम एक्सपर्ट कातिल तक पहुंचता है तो पाठक भी चौंके बिना नहीं रह पाता।
        दस बजकर दस मिनट एक पठनीय उपन्यास है जो पाठक को किसी भी स्तर पर निराश नहीं करेगा।

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उपन्यास - दस बजकर दस मिनट
लेखक -   अरुण सागर
प्रकाशक-  शिवा पॉकेट बुक्स- मेरठ
वर्ष-       -
पृष्ठ        - 239
मूल्य      -
लेखक का पता-
   - अरुण आनंद
      540, G.H.-13
       पश्चिम विहार, नई दिल्ली- 110087

         

Tuesday, 6 March 2018

101. चालीसा का रहस्य- डाॅ. रुनझुन सक्सेना


हनुमान चालीसा और मर्डर मिस्ट्री का अनोखा संयोग।
चालीसा का रहस्य- रुनझुन सक्सेना, जासूसी उपन्यास, रोचक, पठनीय।
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  लोकप्रिय उपन्यास साहित्य में जहां परम्परागत आधार पर उपन्यास लेखन की अंधानुकरण परम्परा रही है, वहीं कुछ लेखकों ने नये प्रयोग भी किये हैं। हालांकि ऐसे प्रयोग बहुत कम देखने को मिलते हैं । ऐसा ही एक प्रयोग किया है डाॅ. रुनझुन सक्सेना शुभानंद ने अपने प्रथम उपन्यास 'चालीसा का रहस्य' में। 
      उपन्यास में हनुमान चालीसा को आधार बना कर कैसे एक रहस्य को सुलझाया जाता है यह वास्तव में पठनीय है। लेखिका का यह प्रयोग कामयाब भी रहा है। हनुमान चालीसा के छंदों को एक नये रूप में प्रस्तुत करना प्रशंसनीय कार्य है।
               डाॅ. अंजना एक मशहूर शोधकर्ता होने ले साथ -साथ एक सुशिक्षित प्रोफेसर एवं अत्यंत प्रतिभाशाली गाइड भी थी। (पृष्ठ-5) और एक दिन दिल का दौरा पङा और उसके कुछ दिन उनकी मृत्यु हो गयी। सभी को डाॅ. अंजना की मृत्यु संदिग्ध लगी।
      डाॅ. अंजना का एक सुयोग्य शिष्य संजीव जो की डाॅ. अंजना के सानिध्य में P.HD. कर रहा होता है। जब संजीव डाॅ. अंजना की मृत्यु के पश्चात अपने थीसिस के पेपर लेने अंजना के घर जाता है वहाँ से उसे एक रहस्यम बक्सा मिलता है और उस बक्से के साथ एक हनुमान चालीसा की छोटी सी पत्रिका।
       लेकिन न तो वह बक्सा कोई सामान्य था और न वह हनुमान चालीसा। वह कोई साधारण बक्सा न था। वह एक विशेष पद्धति से खुलने वाला एक बक्सा था। 
और जब वह बक्सा खुला तो कई रहस्य सामने आये।

- क्या डाॅ. अंजना की मृत्यु स्वाभाविक थी या अस्वाभाविक?
- क्या था उस बक्से में?
- वह बक्सा कैसे खुला? (उपन्यास का यह एक सस्पेंश भाग है)
- संजीव की थीसिस का क्या हुआ?
- डाॅ. अंजना के कातिल कौन थे?
- डाॅ. अंजना की हत्या क्यों हुयी, कैसे हुयी?
- हत्यारा कैसे पकङा गया?
- क्या रहस्य था हनुमान चालीसा में?
    ऐसे एक नहीं अनेक प्रश्नों के उत्तर डाॅ. रुनझुन सक्सेना शुभानंद द्वारा लिखे गये उपन्यास 'हनुमान चालीसा' को पढकर ही‌ मिलेंगे।
         
          उपन्यास कई दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। जहाँ एक तरफ यह उपन्यास मर्डर मिस्ट्री है और उस मर्डर मिस्ट्री को हल करने वाले युवा हैं, वहीं उपन्यास में मेडिकल क्षेत्र की बहुत सी जानकारी भी उपन्यास में उपलब्ध है। इनके साथ-साथ हनुमान चालीसा की व्याख्या भी बहुत सुंदर ढंग से दी गयी।
           अगर बात सिर्फ हनुमान चालीसा की व्याख्या की करें तो यह व्याख्या मात्र धार्मिक दृष्टिकोण से न देकर आध्यात्मिक दृष्टिकोण से दी गयी है। इसमें राम, सीता, लक्ष्मण, हनुमान, रावण आदि को प्रतीक रूप में प्रस्तुत किया गया है।
उदाहरण देखें- "...नायक भगवान राम हैं। वह शरीर है, जो कि तुम हो।.....माँ सीता ' आत्मा' है जो तुम्हारे सुक्ष्म शरीर (Astral body) का प्राण है.........इसी तरह लक्ष्मण तुम्हारी 'चेतना' या यूँ कहो कि 'विवेक' और 'इच्छा शक्ति' का रूप है।..।" (पृष्ठ-45)
          इसी प्रकार हनुमान चालीसा भी एक सामान्य पत्रिका न होकर हमारे मन को जानने का एक रास्ता है।
- हनुमान चालीसा तुम्हे तुम्हारे अंतस को जानने का रास्ता दिखाती है और हमारे सभी प्रश्नों के उत्तर भी वहीं छिपे होते हैं। बस जरूरत  सिर्फ यह जानने की है कि कैसे कोई अपने अंतस को पहचानकर उसके भीतर गहरे में छिपे गूढ ज्ञान को जानकर सारे उत्तर ढूँढने में सफल हो सकता है।"-(पृष्ठ-42)

गलती-
पवन अब खुद को शून्य में तैरता उतरता महसूस कर रहा था। (पृष्ठ-39)
यहाँ पवन की जगह संजीव शब्द आना था।

अनुवादक
      चालीसा का रहस्य उपन्यास मूलतः अंग्रेजी उपन्यास the secret of chaleesa का हिंदी अनुवाद है। यह अनुवाद किया है अनुवादक सबा खान जी ने।
      उपन्यास का अनुवाद बहुत अच्छा किया गया है। शब्दों और भावों का उचित अनुपात उपन्यास में उपलब्ध है। 
अच्छे अनुवाद के लिए सबा खान जी को धन्यवाद।


निष्कर्ष
प्रस्तुत उपन्यास एक बहुत ही अच्छा और पठनीय उपन्यास है। जहाँ एक तरफ पाठक को अच्छी मर्डर मिस्ट्री और सस्पेंश पढने को मिलेगा वहीं दूसरी तरफ हनुमान चालीसा की अच्छी व्याख्या भी इसमें उपस्थित है। और दोनों की एक साथ प्रस्तुति उपन्यास को बहुत रोचक बना देती है।
    उपन्यास पठनीय है, अवश्य पढें।
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उपन्यास- चालीसा का रहस्य (The secret of chaleesa)
लेखिका- डाॅ. रुनझुन सक्सेना शुभानंद
अनुवादक- सबा खान
प्रकाशक- सूरज पॉकेट बुक्स
ISBN-978-1-944820-73-2
वर्ष-फरवरी 2017
पृष्ठ-194
मूल्य-150₹
संपर्क- 
Email- soorjpocketbooks@gmail.com

Friday, 2 March 2018

100. आग का खेल- आरिफ माहरवी

एक छोटी सी मर्डर मिस्ट्री
आग का खेल- आरिफ माहरवी, मर्डर मिस्ट्री, औसत उपन्यास।
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      आरिफ माहरवी अपने समय के चर्चित उपन्यासकार रहे हैं। मैंने इस उप‌न्यास से पहले उ‌नका लिखा गया कोई भी उपन्यास नहीं था।
  आग का खेल उनका लिखा गया एक छोटा सा परंतु रोचक उपन्यास है।
        
  सेठ सोमनाथ जो की शहर के एक प्रसिद्ध व्यवसायी है। एक रात उनके कमरे में आग लग जाती है और सेठ जी उस आग में जल कर मर जाते हैं।
                   CID के अफसर को यह मामला दिया जाता है और वे अपने विवेक से इस मर्डर मिस्ट्री को हल करते हैं। और अनंतः असली अपराधी को पकङ लेते हैं।
     उपन्यास की यही एक छोटी सी कहानी है और शेष उपन्यास इस पर केन्द्रित है। 

- सेठ सोमनाथ का हत्यारा कौन है?
- सेठ सोमनाथ की हत्या क्यों की गयी?
- हत्यारा कैसे पकङा गया।
                          उपन्यास में बार-बार कई पात्रों पर शक होता है की ये पात्र हत्यारा हो सकता है। और कभी ये अभी लगता है कहीं कोई गहरी साजिश तो नहीं।
          

     किसी भी मर्डर मिस्ट्री में तीन प्रश्न महत्वपूर्ण होते हैं ( मृत्यक और हत्यारा, हत्या का कारण, हत्यारा कैसे पकङा गया) और कहानी इन्हीं पर ही आधारित होती है। आग का खेल उपन्यास में यही तीनों बाते संतुलन बना कर चलती हैं।
  
      हत्या होने के पश्चात पाठक के मन में सर्वप्रथम यही प्रश्न उठता है की हत्यारा कौन है। यहाँ भी सेठ सोमनाथ की हत्या के पश्चात् यही प्रश्न पूरे उपन्यास में घूमता है।
        और CID के होनहार सदस्य इरफान(उपन्यास में इर्फान लिखा है) और कैसर इस रहस्य को सुलझाते हैं।
  
  उपन्यास में दृश्य भी ज्यादा नहीं है। चार-पांच जगह से ज्यादा के दृश्य नहीं है।
सेठ सोमनाथा का घर, सोहना लाल का घर , होटल, CID का आॅफिस इत्यादि।
           उपन्यास के प्रथम दृश्य में लेखक दादर के दृश्य को छोङकर कहीं भी ऐसा नहीं लगता के उपन्यास में कोई अनावश्यक विस्तार हो।  और उपन्यास का यही दृश्य हास्य उत्पन्न करने वाला है।
  "रोमांस तो लेखकों का भाग्य होता है बेगम...वह वास्तविक जीवन में नहीं तो उपन्यास के पन्नों में रोमांस लङाते हैं। बाल सफदे भी हो जायें तो भी ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे उपन्यास के हीरो हम ही हैं।" (पृष्ठ-24)
   
  निष्कर्ष में कह सकते हैं की आरिफ माहरवी का उपन्यास आग का खेल एक औसत स्तर का उपन्यास है। उपन्यास छोटा सा है लेकिन किसी भी स्तर पर पाठक को निराश भी नहीं करता। कहानी एक बार तो पठने योग्य है। 
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उपन्यास- आग का खेल
लेखक - आरिफ माहरवी
प्रकाशक- स्टार पॉकेट बुक्स, 4/5 B, आसफ रोङ, नई दिल्ली-01
वर्ष- नवंबर, 1971
पृष्ठ- 128
मूल्य-

Saturday, 17 February 2018

99. इंसाफ का सूरज- वेदप्रकाश शर्मा

 रहस्य के आवरण में लिपटी एक रोचक कहानी।
इंसाफ का सूरज- वेदप्रकाश शर्मा, जासूसी उपन्यास, रहस्य-रोमांच, उत्तम।

 वेदप्रकाश शर्मा को सस्पेंश का बादशाह कहा जाता है। उनके उपन्यास में सस्पेंश इस हद तक होता है की पाठक भी आश्चर्यचकित सा रह जाता है की आखिर ये हो क्या गया।  पृष्ठ दर पृष्ठ जिस प्रकार इनके उपन्यासों की कहानी बदलती है पाठक सोच भी नहीं सकता।  इन्हीं विशेषताओं के कारण वेदप्रकाश शर्मा को सस्पेंश का बादशाह कहा जाता है।
       वेदप्रकाश शर्मा का उपन्यास इंसाफ का सूरज भी इसी प्रकार का उपन्यास है जिसमें‌ प्रत्येक पृष्ठ पर रहस्य/सस्पेंश का जाल बिछा हुआ है। पाठक एक रहस्य से बाहर निकलता है तो दूसरा रहस्य उसका इंतजार करता है।
    उपन्यास की कहानी है एक ठाकुर परिवार की हवेली की। ठाकुर परिवार में मुखिया है ठकुराईन सुलोचना देवी और उसके पुत्र श्रीकांत, उसकी पत्नी और एक छोटा बेटा विक्की,  ठकुराईन का दूसरा पुत्र है शूरवीर सिंह । उपन्यास की कहानी आरम्भ होती है शूरवीर सिंह की शादी से...   "उस अभिशप्त हवेली की दुल्हन बनने वाली हर लङकी को शादी के कुछ दिन बाद कत्ल कर दिया जाता है..शूरवीर की दो पत्नियों को कत्ल किया जा चुका है- पहले माधवी और फिर निशा, एङी-चोटी का जोर लगाने के बावजूद पुलिस आज तक पता नहीं लगा पाई कि हवेली की दुल्हन की हत्याएं कौन करता है?" (पृष्ठ-06)
       कोई भी व्यक्ति अपनी बेटी की शादी इस परिवार में नहीं करना चाहता, सभी उस हवेली को अभिशप्त मानते हैं और उन्हें डर भी है कहीं उनकी बेटी मौत का शिकार न हो जाये। लेकिन उसी गाँव का एक शराबी अपनी अनाथ भानजी मँजू की शादी शूरवीर सिंह के साथ तय कर देता है। और जब मँजू को इस बात का पता चलता है-
"न..नहीं ...!"-वीनस कि मूर्ति जितनी सुंदर -मासूम एवं भोली मंजू हिस्टीरियाई अंदाज में चीख पङी- " नहीं मामा..मैं हरगिज़ यह शादी नहीं करुंगी- हवेली की दुल्हन नहीं बनूगी मैं।"(पृष्ठ-06)
लेकिन लालची मामा के सामने मँजु की एक न चली।
"लालच और बेईमानी ऑक्सीजन नहीं कार्बन डाइऑक्साइड  है जो जिस्म में‌ पहुंचने के बाद इसे खोखला ही करती है।" (पृष्ठ-14) 
दुल्हन बनकर हवेली में आई उस मासूम की आँखों में दूर-दूर तक सिर्फ और सिर्फ मौत के साये नजर आ रहे थे। चेहरा किसी लाश के चेहरे की तरह निस्तेज - दिल‌ ने मानों मृत्यु से पहले धङकना बंद कर दिया था। (पृष्ठ-75)
       हवेली में मँजु को सभी हत्यारे ही नजर आते हैं। और उपन्यास यही आरम्भिक पृष्ठ तो मँजु के साथ-साथ पाठक को भी चौंकाने में अदभुत सक्षम हैं। न तो मँजु समझ सकती है किस पर विश्वास करुं और नहीं ही पाठक।
    सभी से डरी सहमी मँजु किसी पर विश्वास नहीं कर पाती और विश्वास करे भी तो किस पर उसे तो सभी एक जैसे ही नजर आते हैं।
कुबङे और बदसूरत बबरु ने उसे बुरी तरह से जकङ रखा था -मुँह पर जमें उसके हाथ में ऐसी सख्ती थी कि मंजु को वह बूढा नहीं लगा- हैरतवश फटी आँखों से उसने देखा की कमरे का दरवाजा इस वक्त अंदर से बंद है (पृष्ठ-39)
कभी उसे अपना पति खतरनाक लगता है तो कभी सास, कभी नौकर बबरू तो कभी घर आया हुआ बाबा चाण्डाल।
चाण्डाल बाबा- भूत -प्रेतों को अपने वश में रखने और तांत्रिक विद्या से किसी की भी हत्या करने में सिद्धहस्त एक दुष्ट तांत्रिक।(पृष्ठ-40)
       आखिर ऐसा क्या घटित हो रहा था हवेली में, और उसी घटित होने वाले घटनाक्रम के खिलाफ एक दिन मँजु की आवाज बुलंद हो ही गयी।
"किसी और की बात छोङिए मांजी, मगर मुझे हक है।"- चेहरे पर अजीब सी दृढता लिए मंजू कह उठी - " इस हवेली में क्या होता है, क्यों होता है। यह सब जानने का हक मुझे इसलिए है, क्योंकि मैं हत्यारे की अगली शिकार हूँ।"(पृष्ठ-80)
   लेकिन इन सब से परे एक ऐसा भी शख्स था जो भूत-प्रेतों पर विश्वास नहीं करता और वह है इंसाफ का सूरज। इंस्पेक्टर सूरज। जिसने स्पष्ट कहा- 
"आप विश्वास रखें सर.....रहस्य की सभी पर्तों पर से पर्दा उठाने के बाद हत्यारे को आपके सामने लाकर खङा कर दूंगा और मंजू की हिफाजत मेरा पहला मकसद होगा।"(पृष्ठ-17)
      इस रहस्य में लिपटी कहानी में एक नया मोड तब आता है जब उपन्यास में बिल्ली आती है। हालांकि बिल्ली तो मँजु की शादी में भी अपशगुन करती है। लेकिन ये बिल्ली तो पूरे घटनाक्रम तो ही बदल कर रख देती है। इस बिल्ली के आगमन से तो पाठक उछल कर खङा हो जाये। बहुत खतरनाक है ये बिल्ली । इस बिल्ली की एक  पंक्ति बहुत है।- "हल्लो..हल्लो ..मैं बिल्ली बोल रही हूँ।" (पृष्ठ-104)
      लेकिन जनाब किस्सा यहीं खत्म नहीं होता। अभी तो आ बिल्ली तक ही पहुँचे हो  अभी तो और भी जंगली जानवर यहाँ उपस्थित हैं। उपस्थित भी क्या खतरनाक तरीके से उपन्यास पर छाये हुये हैं। और ऐसा ही खतरनाक एक और जीव है - लोमङी।
 खुद लोमङी के मुँह से सुन लीजिएगा-
" लोमङी की आदत है, जब खुद को नहीं मिलता तो बिखेर देती है।"(पृष्ठ-110)
जहाँ बिल्ली की इंंट्री पाठक को चौंकाती है पूरे घटनाक्रम को बदल कर रख देती है वही लोमङी की इंट्री तो उपन्यास के खलनायक को ही हिलाकर रख देती है।
 उपन्यास की कहानी के बारे में जितना लिखा जाये उतना बहुत कम है। अगर कहानी का वास्तविक आनंद लेना है तो वेदप्रकाश शर्मा का उपन्यास इंसाफ का सूरज अवश्य पढें।

- क्या था अभिशप्त हवेली का रहस्य?
- कौन था शूरवीर सिंह की पत्नियों का हत्यारा?
- क्या मंजु की जान बच पायी?
- कौन थी बिल्ली?
-कौन थी लोमङी?
- आखिर लोमङी चाहती क्या थी?
- आखिर क्या घटनाक्रम घटित हो रहा था?
- क्या इंस्पेक्टर सूरज वास्तविक का पता लगा पाया ?
- इंस्पेक्टर सूरज का वास्तव में इंसाफ कर पाया?
   ऐसे एक नहीं अनेक प्रश्नों के उत्तर तो इंसाफ का सूरज उपन्यास पढकर ही मिल सकते हैं।
               
          इंसाफ का सूरज उपन्यास वास्तव में पठनीय है। उपन्यास की कहानी जिस प्रकार पृष्ठ दर पृष्ठ बदलती है वह वास्तव में बहुत रोचक है। उपन्यास के पात्र भी एक से बढकर एक हैं जो पाठक को बार-बार चौंकातॆ हैं। कौन सा पात्र कब कौन सा रंग बदल जाये पता ही नहीं चलता।

    निष्कर्ष- वेदप्रकाश शर्मा का प्रस्तुत उपन्यास 'इंसाफ का सूरज' रहस्य में डूबा हुआ वो कथानक है जो पाठक को अपने साथ जोङे रखने में पूर्णतः कामयाब है।
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उपन्यास- इंसाफ का सूरज
लेखक- वेदप्रकाश शर्मा
प्रकाशक- मनोज पॉकेट बुक्स
पृष्ठ-251
मूल्य-20₹