Saturday, 30 December 2017

85. एक कैदी की करामात- अलेक्जेंडर ड्यूमा


एक ‌मासूम युवक की त्रासदी भरी कहानी।
बाल उपन्यास, रोचक- पठनीय
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एलेक्जेंडर डयूमा का यह बाल उपन्यास बहुत ही रोचक है। 
यह एक एडमंड दांते नामक युवक की कहानी है जो एक पानी के जहाज पर काम करता है। यह एडमंड दांते नामक युवक बहुत ही सीधा है और हर किसी पर विश्वास कर लेता है इसी विश्वास के परिणाम स्वरूप उसे उस जुर्म की सजा हो जाती है जिसका उसे पता तक नहीं होता। 
  एडमंड को राजद्रोही माना जाता है, उसके पास से एक खत मिलता है।
     एक सिपाही ने जहाज से एडमंड के कमरे से मिला कागज मेयर के हाथ में रख दिया।........कागज देखते- देखते मेयर के माथे पर पसीना आ गया। (पृष्ठ-17)
   एडमंड दांते का बाप, उसकी मंगेतर और उसके जहाज का मालिक उसका इंतजार करते हैं लेकिन शहर का मेयर उसे एक टापू पर स्थित जेल में बंद करवा देता है।
        समुद्र के अंदर एक टापू है और उसी टापू पर एक जेल है। एडमंड दांते को उसी जेल में कैद रखा जाता है।
     उस जेल में एडमंड को  एक ऐसा व्यक्ति मिलता है जो उसे अमीर बना देता है।

- एडमंड को जेल की सजा क्यों होती है?
- मेयर उस पत्र से क्यों घबरा जाता है?
- एडमंड जेल से बाहर कैसे निकला?
- एडमंड को जेल में मिला व्यक्ति कौन था?
- एडमंड अमीर कैसे बना?
- एडमंड ने अपने दुश्मनों से बदला कैसे लिया?
     जैसे एक नहीं अनेक प्रश्न है जो इस बाल उपन्यास को पढकर ही प्राप्त होंगे।

उपन्यास की कहानी बहुत रोचक है लेकिन इसका समापन बहुत जल्दी-जल्दी हो जाता है। आरम्भ में जहाँ कहानी विस्तार से लिखी गयी है वहीं अंत में आकर तो इसे बिलकुल संक्षिप्त कर दिया। अब पता नहीं यह कारनामा लेखक का है या अनुवादक का लेकिन कहानी का आनंद खत्म कर दिया।

     फिर भी इस बाल उपन्यास को पढा जा सकता है। पाठक को किसी भी स्तर पर निराशा का सामना नहीं करना पड़ेगा ।

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उपन्यास- एक कैदी की करामात
लेखक-    एलेक्जेंडर ड्यूमा
अनुवाद-  श्री कांत व्यास
प्रकाशक- शिक्षा भारती, मदरसा रोङ, कश्मीरी गेट, दिल्ली।
प्रकाशन वर्ष- 2003©
पृष्ठ-80
मूल्य- 20₹


Thursday, 28 December 2017

89. खामोश, मौत आती है!- कर्नल रंजीत

.                    मौत का अनोखा खेल
खामोश, मौत आती है- कर्नल रंजीत, थ्रिलर, रोमांच।    मेजर बलवंत का कारनामा।
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          दिल्ली शहर में एक के बाद एक खूबसूरत लङकियों का अपहरण होता है। बहुत कोशिश के पश्चात भी पुलिस किसी नतीजे पर नहीं पहुँच पाती। तब दिल्ली शहर में आये मेजर बलवंत की मुलाकात पुलिस इंस्पेक्टर रंजीत से होती है। इस तरह मेजर बलवंत इस अपहरण के केस से जुङ जाता है।  इसी दौरान एक फोटो स्टुडियो पर काम करने वाले मथुरा दास का कत्ल हो जाता है। इस कत्ल के पश्चात मेजर बलवंत और उसकी टीम एक -एक कङी जोङती जाती है और जा पहुंचती है असली अपराधी तक।

- जासूसी उपन्यास लेखन के सरताज कर्नल रंजीत की अनोखी कलम से हैरतअंगेज कारनामों से भरा एक और अनोखा कारनामा- खामोश, मौत आती है।
- कैसी थी वह मौत, जो बिना किसी आहट के चुपचाप चली आती थी? क्या सचमुच मौत थी वह या मौत से भी बढकर कुछ और?
- राजधानी में खूबसूरत लङकियों का एक के बाद एक अपहरण होने लगता है और फिर उनके मंगेतर या प्रेमी भी गायब होने लगते हैं, क्या तालमेल था दोनों तरह के अपहरण में?
- खूबसूरत जवानियों को तबाह करने का घिनौना और भयानक खेल। कौन था वह सफेदपोश भेङिया, जो मासूम युवक-युवतियों को जीते जी मौत भेंट देता था।
- भावनाओं की ब्लैकमेलिंग का अजीबोगरीब तरीका जिसे शातिर बदमाश की बुद्धि ही खोज सकती थी।
- सनसनी और रहस्य-रोमांच का जबरदस्त तूफान जो मन -मस्तिष्क को हिलाकर रख देता है।
    भारत की सर्वप्रथम पाॅकेट बुक्स हिंद पॉकेट बुक्स की प्रस्तुति कर्नल रंजीत का उपन्यास - खामोश, मौत आती है।

        उपन्यास का आरम्भ जितना अच्छा होता है उसके बाद यह उपन्यास इतना अच्छा रह नहीं पाता। कहीं- कहीं तो लगता है पता नहीं कहानी कहां जा रही है। उपन्यास को आवश्यक से ज़्यादा घूमाने के चक्कर में लेखक मूल कहानी से भटका सा लगता है। और इसी भटकाव के चक्कर में कहानी का आनंद खत्म हो जाता है।
      पाठक जहाँ प्रारंभ में शहर में हो रहे खूबसूरत लङकियों के अपहरण को जानने को  बेचैन है, तभी वहाँ मथुरादास के कत्ल का किस्सा आरम्भ हो जाता है। अभी यह किस्सा पूरा नहीं हो पाता की नकली नोटों की चर्चा चल निकलती है। और नकली नोटों का किस्सा पूरा सिरे नहीं चढता की शहर में कुछ युवाओं के अपहरण के घटना घटित हो जाती है। पाठक अभी इनसे से निपट नहीं पाता की उपन्यास खत्म भी हो जाता है।
    उपन्यास को अच्छा बनाया जा सकता था पर लेखक ज्यादा नाटकीय घटनाओं के चक्कर में उपन्यास की मूल कहानी के साथ न्याय नहीं कर पाया।
उपन्यास के अंत में जिसे अपराधी दिखाया गया वह भी कोई दमादार नहीं लगा।
   
        मनोरंजन के लिए इस उपन्यास को एक बार तो पढा जा सकता है।

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उपन्यास- खामोश, मौत आती है।
लेखक- कर्नल रंजीत
प्रकाशक- हिंद पॉकेट बुक्स
पृष्ठ-
मूल्य- 06(तात्कालिक)

87. साहित्य समर्था- पत्रिका

साहित्य समर्था- एक साहित्यिक पत्रिका
प्रथम अंक, अगस्त-सितंबर-2017

जयपुर से प्रकाशित होने वाली साहित्यिक पत्रिका साहित्य समर्था का प्रथम अंक प्राप्त हुआ।
   
  प्रस्तुत अंक कथाकार डाॅ. बानो सरताज को समर्पित है। इसलिए इस अंक में अधिकांश रचनाएँ बानो सरताज की ही हैं और आवरण पृष्ठ का चित्र भी बानो सरताज का है। यह एक अच्छा व सराहनीय प्रयास है। इस अंक में बानो सरताज की कहानी, कविता, लेखन यात्रा, व्यंग्य- हास्य, आलेख आदि पाठक को पढने को मिलेंगे।
संपादिका महोदया लिखती हैं। "समर्था का प्रस्तुत अंक वरिष्ठ साहित्य डाॅ. बानो सरताज काजी को समर्पित है। बहुआयामी लेखन की धनी डाॅ. बानो सरताज का समृद्ध लेखन संसार एवं समाजसेवी व्यक्तित्व प्रशंसनीय है।" (पृष्ठ- 03)

  इसके अलावा भी अन्य बहुत से रचनाकरों को स्थान दिया गया है।

बानो सरताज की कहानी 'दस्तक' में  कई रंग देखने को मिलेंगे।  कहानी में रोचकता और रहस्य भी है और अंत पूर्णतः मार्मिक। इनकी अन्य कहानियाँ भी रोचक हैं लेकिन इनके व्यंग्य भी दिये गये हैं वह मुझे न तो व्यंग्य लगे न ही हास्य।
    मालती जोशी की कहानी 'मन धुआं-धुआं' पढना भी बहुत अच्छा अनुभव कराती है। मुकुट सक्सेना की 'अस्तित्व-बोध', डाॅ. पूनम गुजराती की 'मेहंदी' , चन्द्रकांता की 'एक लङकी शिल्पी'

लघुकथा में नरेन्द्र कुमार गौङ की लघुकथा 'भ्रष्टाचार' यह दर्शाने में सफल रही है की हम स्वयं भ्रष्ट होकर अपना दोष न देखकर दूसरों को दोष देते हैं।
लघुकथा में किशन लाल शर्मा की 'हक', पूर्णिमा मित्रा की ' आस के दिये' भी अच्छी हैं।

   सबसे अलग हटकर प्रस्तुति है जर्मनी की युट्टा आॅस्टिन का साक्षात्कार। यह साक्षात्कार लिया है आभा सिंह ने।
   युट्टा आॅस्टिन जर्मन महिला है। विवाह पश्चात अपने पति के देश इंग्लैंड में कोल चैस्टर नामक स्थान पर रहती है। वे कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय कोल चैस्टर में यूरोपीय भाषाओं की व्याख्याता है, साथ ही साथ हिंदी की विदूषी है और अध्यापन भी करती है। (पृष्ठ -58)
                    हिंदी भाषा के प्रति प्रेम विषय पर वे कहती है- "हिंदी इतनी सुंदर और बढिया भाषा लगी कि उसे सीखने लगी और भारत के बारे में पढने लगी।" (पृष्ठ- 58)

   इस अंक की काव्य रचनाएँ भी बहुत सराहनीय है।
डाॅ. नरेन्द्र शर्मा 'कुसुम' राष्ट्र ध्वज क लिए लिखते हैं।

   -  तू हमारे देश की पहचान है,
      कोटि कंठों से उमङता गान है,
      तीन रंगों में फहराता व्योम में
     एकता की तू सुरीली तान है। (पृष्ठ-33)
    
    स्त्री वर्ग को लेकर लिखी गयी रचनाएँ भी अच्छी हैं। डाॅ. अंजु दुआ 'जैमिनी' की कविता ' स्त्री, मात्र देह' में स्त्री की स्वतंत्रता का वर्णन करती है।
  स्त्री चारदीवारी से निकल
  बढी खुली हवा में
  कुछ पाना है- सब कुछ पाना है। (पृष्ठ- 37)

              डाॅ. पद्मजा शर्मा की रचना 'लङकी' भी स्त्री वर्ग की बात करती है।
         जितना सरल है कह देना लङकी
         हकीकत में उतना ही कठिन है होना लङकी
          जितने पल जीती है उससे कहीं ज्यादा पल ‌मरती है लङकी। (पृष्ठ- 37)
       
संगीता गुप्ता की कविता 'माँ', मीरा सलभ की 'गम ही फलते रहे', डाॅ अमिता दुबे की 'ऐसा मन करता है', डाॅ संगीता सक्सेना की ' राखी', आदि काव्य रचनाएँ भी पठनीय है। शिवानी शर्मा की 'स्त्री', सत्यदेव संतिवेन्द्र की 'प्रश्न सहेजे चेहरे, सुकीर्ति भटनागर की कविता 'बस एक पल' भी सराहनीय रचनाएँ हैं।
 
   मधु प्रमोद अपनी कविता 'हम सी ना बेटियाँ होती' में कहती हैं-     ये हवाएं हैं
                  एक जगह रह नहीं सकती
                  ये ऋचाएं हैं
                  कभी खुलकर नहीं कहती। (पृष्ठ-46)

         इनके अतिरिक्त इस अंक में साहित्यिक चर्चा और पुस्तक समीक्षा भी दी गयी है।
     साहित्य समर्था का प्रस्तुत अंक वास्तव में बहुत अच्छा है। संपादिका नीलिमा टिक्कू जी धन्यवाद की पात्रा है जिन्होंने इस कठिन कार्य को अंजाम दिया है।
     इस पत्रिका की एक और विशेषता है वह है इसका मजबूत संपादन पक्ष तथा उच्च स्तर के कागज पर मुद्रण। यह दोनों विशेषताएँ पत्रिका को और ज्यादा मजबूती प्रदान करती है।
   पूर्णतः सफेद पृष्ठों पर अंकित काले -काले अक्षर मन मोह लेते हैं।
    पत्रिका का प्रथम अंक पठनीय है।
पुनश्च: उन सभी रचनाकारों और संपादन मण्डल का धन्यवाद जिनके अथक प्रयास से साहित्य समर्था का प्रथम अंक साहित्य जगत में आया।
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पत्रिका- साहित्य समर्था (त्रैमासिक)
संपादिका- नीलिमा टिक्कू
अंक- जुलाई- सितंबर, 2017 ( वर्ष-1, अंक-01)
पृष्ठ-
मूल्य- एक अंक- 50₹, वार्षिक- 200₹

संपर्क-
ई-311, लालकोठी स्कीम, जयपुर- 302015
दूरभाष- 0141-2741803, 2742027
Email- sahityasamartha@gmail.com
          - neelima.tikku16@gmail.com

Monday, 25 December 2017

85. कारीगर- वेदप्रकाश शर्मा

एक अजब किरदार की गजब कहानी

कारीगर- वेदप्रकाश शर्मा, उपन्यास, रोमांच, पठनीय।

वेदप्रकाश शर्मा सामान्य कहानी को एक विशेष अंदाज में कहने के लिए जाने जाते है।
  कहानी चाहे कितनी भी सहज और सामान्य हो लेकिन वेदप्रकाश शर्मा जी उसमें ऐसे घुमाव पैदा करते हैं की पाठक सोचता रह जाता है आगे क्या होगा।
   प्रभावशाली लेखक भी वही है जो पाठक को कहानी से जोङे रखे।  और इस विषय में वेदप्रकाश शर्मा जी अपने समकालीन उपन्यासकारों में अग्रणी रहें हैं।

   पाठक एक बार उपन्यास आरम्भ करता है तो फिर आगे सोचता रहता की कहानी में आगे क्या होगा। इस दृष्टि से कारीगर उपन्यास भी खरा उतरता है। संपूर्ण उपन्यास में पाठक पृष्ठ दर पृष्ठ यही सोचता रहता है की कहानी में आगे क्या होगा और जो आगे होता है वह पाठक की सोच से बहुत आगे का होता है। जहाँ पाठक को लगता है की यहाँ वही हुआ जो मैंने (पाठक) ने सोचा, ठीक उसके आगामी पृष्ठों पर पता चकता है की पाठक का दृष्टिकोण गलत था।
  अपनी इसी विशेषता के लिए वेदप्रकाश शर्मा जाने जाते हैं।

  प्रस्तुत उपन्यास कारीगर भी एक ऐसी ही घटना से आरम्भ होता है। फिल्म डायरेक्टर महेश घोष के कार्यालय में चक्रेश नामक युवक पिस्टल के दम पर जबरन घुस आता है और वहाँ बैठ महेश घोष व अन्य से जबरदस्ती रुपये, गहने आदि ले लेता है। सब डरे सहमें बैठे हैं लेकिन चक्रेश के सामने बोलने की किसी की हिम्मत नहीं। लेकिन अंत में चक्रेश बोलता -
     चक्रेश ने हाथ जोङे। चेहरे पर याचना के से भाव उभर आये। गिङगिङाया -" सर, स्ट्रगलर हूँ । मुंबई में नया-नया आया हूँ। एक्टिंग का शौक है। अपने टेलेंट का नमूना दिखाने का इससे बेहतर कोई और रास्ता नहीं सूझा। आपकी अगली फिल्म में काम मिल जाए तो....।
"हरामी के पिले! एक्टिंग कर रहा था तू! काम मांगने आया था यहाँ।"- घोष दहाङते चले गये। (पृष्ठ-14)
  एक दिन महेश घोष की बेटी की शादी में भी चक्रेश पहुँच गया और उसने ऐसा चक्कर चलाया की दरवाजे पर आयी बारात लौट गयी

  लेकिन फिर एक दिन चक्रेश महेश घोष के घर ही पहुंच गया।
" तो तू यहाँ ही पहुंच गया?"- महेश घोष के हलक से गुर्राहट निकली। " क्यों आए हो यहाँ? "
" सुना है, आप मेरी चमङी उधेङने के तलबगार हैं?"
" चक्रेश तेरा असली नाम नहीं हो सकता। सबसे पहले अपना असली नाम बता।"
उसके गुलाबी होंठों पर मुस्कान उभरी‌। बोला- " लोग चक्कर चलाने वाला ईश्वर ही कहते हैं मुझे।" (पृष्ठ -37)

- तो चक्रेश आज भी एक्टिंग कर रहा था?
- ऐसा क्या किया की महेश घोष की बेटी की बारात वापस लौट गयी?
- चक्रेश ऐसा क्यो कर रहा था?
- क्या चक्कर था चक्रेश की हरकतों के पीछे?
- कौन था चक्रेश?

यह सब तो उपन्यास पढकर ही जाना जा सकता है।

उपन्यास में कुछ रोचक दृश्य भी हैं-
"तुझसे ज्यादा जरूरत  मुझे है।"
"त..तुम्हें?"
"मेरी बीबी की शादी है।"
"ब..बीबी की शादी?
" जल्दी से बैग मेरे हवाले कर।....."
"म..मेरी समझ में नहीं रहा। तुम आखिर किस किस्म के।" (पृष्ठ -13)
   ऐसा ही एक और दृश्य है। वह है चांदनी की शादी के दिन आने वाले दो वकील अपलम- चपलम का।
" तू नहीं समझेगा। अनपढ है न। हम पढे लिखे हैं। वकील ठहरे।"
"तुम दोनों के नाम?"
"अपलम।"- लंबे ने कहा।
गुट्टा बोला -" चपलम" (पृष्ठ-16)
........
चपलम ने सिगार में  कस लगाने के साथ कहा- " हम उस शादी में आमन्त्रित किये जाने वाले सबसे पहले शख्स हैं।"
"अट्ठारह साल पहले ही आमंत्रित कर लिए गये थे।"- अपलम ने फिर पीक थूका -" इसलिए पधारे भी सबसे पहले हैं।" (पृष्ठ-17)
ये पात्र उपन्यास में जब भी आये उपन्यास को रोचक बनाते चले गये।

  उपन्यास के प्रथम पृष्ठ पर उपन्यास के बारे में कुछ लिखा गया है, आप भी पढ लीजिएगा।
      करीब इक्कीस साल पहले एक कत्ल हुआ।
मजे की बात - कत्ल होने वाले को मालूम था कि उसका कत्ल होने वाला है। इतना ही नहीं, उसे यह भी मालूम था कि कत्ल कौन करने वाला है। बावजूद इसके वह अपना कत्ल होने से रोक नहीं सकता था।
क्यों? यह है इस कहानी का पहला पेंच
दूसरा पेंच-  इक्कीस साल बाद एक बैंक का लाॅकर खुला। उससे ऐसे सबूत बरामद हुये जो अकाट्य रूप से उस शख्स को हत्यारा साबित करते थे जिसने कत्ल किया था।
    अगर आप जानना चाहते हैं कि कत्ल होने वाले ने इक्कीस साल बाद अपने कातिल को फांसी कराने का यब चमत्कार कैसे कर दिखाया तो हिंदी के सबसे ज्यादा बिकने वाले उपन्यासकार वेदप्रकाश शर्मा के इस उपन्यास को जरूर पढें।

  उपन्यास का आरम्भ जितना रोचक है इसका समापन भी उतना ही रोचक है।  लेकिन उपन्यास का मध्यांतर बहुत ज्यादा निराश करता है। वहाँ ऐसा लगता है जैसे उपन्यास ठहर गया हो और वही पुरानी कथा कहानी की तरह एक नायक नाराज या नायक से नफरत करने वाली नायिका को मनाने के उपाय करता नजर आता है।

पृष्ठ संख्या 164 -165 पर पुलिस घायल गुण्डों के पास आती है पर उनकी मदद या हास्पिटल पहुंचाने की जगह चक्रेश का पीछा करने निकल जाती है।

    वेदप्रकाश शर्मा जी के स्वयं के प्रकाशन संस्था से प्रकाशित यह उपन्यास बहुत ही रोचक है जो पाठक को दिलचस्प भी लगता है।
  उपन्यास की कहानी पाठक की सोच से बहुत दूर निकल जाती है।
जो पाठक पढता है वह होता नहीं, जो दिखता है वह भी होता नहीं और जो उपन्यास में होता है वह पाठक सोच नहीं पाता।
कहा‌नी का अंत तो बार- बार चौंकाता है।
  उपन्यास रोचक है और पठनीय है।
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उपन्यास- कारीगर
लेखक- वेदप्रकाश शर्मा
प्रकाशक- तुलसी पेपर बुक्स- मेरठ
पृष्ठ- 286
मूल्य- 100₹

Wednesday, 6 December 2017

83. जनकवि रमाशंकर यादव 'विद्रोही'

एक जनता का कवि- विद्रोही
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जनकवि रमाशंकर यादव मेरे प्रिय कवि हैं।

विद्रोही जी की कविताएं और जीवन परिचय यहाँ उपलब्ध है।
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