Monday, 15 May 2017

46. घातक गोली- सुरेन्द्र मोहन पाठक

"ये आपका चेक।"- सोनाली ने मुझे चैक थमाया।
" भई वाह!"- तभी दरवाजे पर प्रकट हुआ शरद बोला- "रिश्वत! वो भी सरेआम! या शायद उजरत। खास उन सेवाओं की जो हो चुकी हैं या अभी होनी हैं?"
"मिस्टर कोहली तुम्हारे पापा के बुलाये यहां आए हैं।"
"किसी के भी बुलाए आए हों लेकिन इस वक्त तो यहाँ है। तुम्हारे साथ। मैंने रंग में आकर भंग डाल दिया।"
"निहायत बदतमीज आदमी हो"- एकाएक मैं आवेशपूर्ण स्वर  में  बोला।
" तुझे बोलने को किसने कहा है कुतिया के हिमायती ?"
तत्काल आपके खादिम के खून में मिली 93-आक्टेन भङकी।
मैं मुट्ठियां भींचे उसकी तरफ बढा।
उसने अपना हाथ सीधा किया तो मुझे उसमें रिवॉल्वर सिखाई दी। उसने रिवॉल्वर की नाल मेरी छाती से लगाकर घोङा खींचा।
सोनाली के मुँह से चीख निकली।
    ऐसा ही सिरफिरा नीमपागल, वहशी, ड्रग एडिक्ट युवक था शरद चौहान जो की जायदाद का मालिक बनने वाला था।
   दिनांक .04.2017 को द्वितीय श्रेणी अध्यापक की परीक्षा थी श्री गंगानगर (राजस्थान) में। तब अपने एक मित्र इन्द्राज बरोङ के साथ गया था। अंकित जांगिङ (ऐलनाबाद, सिरसा) हमें विदा करने आया। मैं गुरप्रीत सिंह, इन्द्राज बरोङ, विकास पचार तीनों को। वापसी में रेल्वे स्टेशन के सामने एक किताबों की दुकान दिखाई दी और में बिना बताये, चुपके से दुकान में जा घुसा। मित्र मण्डली जब तक मुझे खोजती तब तक मैं चार उपन्यास खरीद कर उनके पास पहुंच चुका था।
मैंने वहाँ से प्रकाश भारती के स्लीपिंग पिल्स, लास्ट हिट, सुनील प्रभाकर का मौत का साया और सु.मो. पाठक का घातक गोली आदि उपन्यास खरीदे, मात्र सौ रुपये में।
         सुरेन्द्र मोहन पाठक के उपन्यास घातक गोली की समीक्षा प्रस्तुत है।
    महा सिंह ने एक राज घराने की ऐसी महिला से शादी की थी जिसके पहले एक पुत्र था। वह पुत्र था शरद चौहान। महा सिंह की पत्नी मरते वक्त अनिवार्य शर्तों के साथ वसीयत कर गयी। एक शर्त यह भी थी की एक निश्चित उम्र से पहले अगर शरद चौहान शादी करेगा तो वह जायदाद से बेदखल कर दिया जायेगा। शरद चौहान वह निर्धारण उम्र पूरी करने ही वाला था की उससे पहले वह शादी करने को मचल बैठा।
वृद्ध महा सिंह ने अपनी जवान सेक्रेटरी सोनाली से शादी कर ली।
शरद चौहान ड्रग्स के साथ-साथ जुए में भी उधार लेकर  लाखों रुपये हार चुका है। जब गैंगस्टर जान पी. एलैग्जेंडर ने शरद चौहान से रुपये वापसी का दवाब बनाया तो वह स्वयं को असमर्थ बताने लगा।
  महा सिंह ने शरद चौहान को ड्रग्स जैसे नशे से छुटकारा दिलाने के उस यात्रा पर रवाना कर दिया। शरद चौहान के साथ डिटेक्टिव सुधीर कोहली, फैमिली  डाॅक्टर व बख्तावर सिंह व्यक्ति को यात्रा पर साथ भेजा गया।
  यात्रा के दौरान रात के अंधेरे में शरद चौहान गायब हो गया।
सुधीर कोहली जब वापस घर लौटा तब उसे सूचना मिली की एक लङकी की लाश मिली है और पुलिस को सुधीर पर उसकी हत्या का शक है।
लङकी के जिस्म में दो गोलियाँ  है। एक तब गोली मारी गयी जब वह जीवित थी और दूसरी उसके मरने के बाद।
अब पुलिस देख रही है की इनमें से घातक गोली कौनसी थी, जिसने लङकी  जान ले ली।
- शरद चौहान कहां गायब हो गया?
- क्या रहस्य था शरद चौहान के गायब होने में?
- क्या शरद चौहान ने शादी कर ली?
- मरने वाली लङकी कौन थी?
- उसका चौहान परिवार से क्या संबंध था?
सुमोपा द्वारा लिखा गया सुधीर कोहली सीरीज का  एक तेज रफ्तार उपन्यास है।
स्वयं सुधीर कोहली एक ऐसे जाल में फंस जाता है जिसमें वह जाने- अनजाने स्वयं उलझता जाता है।
उपन्यास की भाषा शैली की बात करें तो यह सुमोपा के उन्हीं चिर-परिचित शब्दों का प्रयोग कर लिखी गयी है जैसा की वह वर्षों से लिखते  रहें हैं।
मुझे हैरानी होती है की लेखक अपनी एक विशिष्ट पहचान रखता है लेकिन वह वर्षों से वहीं घीसे-पिटे शब्द काम में ले रहा है।
वाहियात, बाजरिया, अलबता, जैसे शब्द तो सभी पात्र, सभी उपन्यासों में बोलते हैं।
वहीं इनके उपन्यासों में जो भी कत्ल होते हैं वह भी सभी रिवॉल्वर से होते हैं। वह भी 32 या 28 कैलीबर के रिवॉल्वर से। वही स्मिथ एण्ड वैसन कम्पनी का रिवॉल्वर ।
  सुधीर सीरीज की यह मर्डर मिस्ट्री वास्तव में पढने योग्य है।
प्रस्तुत उपन्यास सुरेन्द्र मोहन पाठक का 203 नंबर पर आता है।
सुधीर कोहली सीरीज का यह 11 वां उपन्यास है।
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उपन्यास- घातक गोली (1997)
लेखक- सुरेन्द्र मोहन पाठक
वर्ग- मर्डर मिस्ट्री
प्रकाशक- राजा पॉकेट बुक्स- दिल्ली
पृष्ठ- 231
मूल्य- 20₹

- लेखक का पता
सुरेन्द्र मोहन पाठक
Post Box No.-9426
दिल्ली-110051
 

2 comments:

  1. सुमोपा के शब्दावली ने ही मुझे उनका दीवाना बनाया है। उनके किरदार एक तरह से जरूर बात करते हैं लेकिन हर किरदार अलग तरीके से बोलता है। जैसे सुधीर और जीता बिलकुल जुदा तरीके से बोलता है। ये बात मुझे अच्छी लगती है। फिर किरदार इंसान ही हैं और इंसान अपने बोलने की शैली बहुत कम बदलते हैं।
    और फिर पाठक साहब की शैली ही उनकी पहचान भी है। कोई पढ़कर बता देता है कि उपन्यास उन्होंने लिखा है। एक तरीके से ये उनका सिग्नेचर ही हुआ।

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  2. पोस्ट का फॉन्ट थोड़ा छोटा है जिससे पढ़ने में तकलीफ होती है। इसे थोड़ा बढ़ा कर देंगे तो पढ़ने में आसानी होगी।

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