Sunday, 16 April 2017

38. हस्ती मिटा दूंगा- टाइगर

एक ईमानदार पुलिस अफसर है। जिसके घर में उसकी पत्नी व एक छोटा भाई। छोटे भाई को माँ-बाप के अभाव में छोटे पुत्र की तरह पाला गया है, इसलिए छोटा भाई थोङा बिगङ गया है।
  पुलिस अफसर ईमानदार है, रिश्वत नहीं लेता। इसलिए खलनायक से दुश्मनी हो जाती है। इस दुश्मनी का परिणाम है पुलिस अफसर की मौत। अब पुलिस अफसर का छोटा भाई आवारागर्दी छोङकर खलनायक से बदला लेता है।
        जी, ये है कहानी टाइगर के उपन्यास ' हस्ती मिटा दूंगा' की।
अब कहानी और नाम से ही स्पष्ट है कौन-किसकी हस्ती मिटाना चाहता है।
उपन्यास वही पुरानी भारतीय फिल्मों की तरह है। इसमें कुछ भी नया या हटकर नहीं है, जिसके दम पर उपन्यास पढा जाये। प्रारंभ के कुछ पृष्ठ पढते ही कहानी आईने की तरह साफ हो जाती है और पाठक को पता चल जाता है की उपन्यास में आगे क्या होगा। अगर आगे होने वाला दृश्य रोचक हो तो भी कहानी पढी जा सकती है, पर यहाँ तो ऐसी रोचकता भी नहीं है।
                    कहानी- पुलिस अफसर डी.सी.पी. शमशेर सिंह राणा, एक ईमानदार व्यक्ति है। दूसरी तरफ उसी शहर में एक स्मगलर है सांगा ठाकुर। एक बार शमशेर सिंह, सांगा ठाकुर के अवैध माल को पकङ लेता है। अब सांगा ठाकुर, डी.सी.पी. शमशेर सिंह को रिश्वत देने की कोशिश करता है और शमशेर सिंह मना कर देता है।
  शमशेर सिंह अब सांगा के अवैध धंधों पर कार्यवाही कर उसे बंद करवा देता है तब गुस्से में आकर खलनायक सांगा, डी.सी.पी. शमशेर सिंह की एक योजना के तहत हत्या करवा देता है।
      जब शमशेर सिंह के छोटे भाई शक्ति सिंह को हकीकत पता चलती है तो वह अपने भाई की मौत का बदला लेना चाहता है। उसी शहर में एक और खलनायक है, शाकाल। जो की सांगा का दुश्मन है और एक ईमानदार खलनायक है। जिन लोगों पर अत्याचार होते हैं उन्हें शाकाल शरण देता है।
अब शाकाल और शक्ति सिंह एक साथ आ जाते हैं, क्योंकि दोनों का दुश्मन एक ही है, वह है सांगा। अब शेष कहानी सांगा से बदला लेने में बीत जाती है।
हैरानी तो तब होती है जब पता चलता है की इस उपन्यास के दो भाग हैं। दूसरा भाग है 'सोने की लंका'।

संवाद- उपन्यास के कुछ संवाद पढने लायक हैं। संवाद उपन्यास के पात्र का चरित्र-चित्रण करने के साथ-साथ उपन्यास की कथावस्तु को भी आगे बढ़ाने में सहायक हैं।
सांगा ने कहा,-"किस जमाने की बात कर रहे हो डी.सी.पी. साहब। आज पाप की लंका ही फलती-फूलती है। शराफत और सच्चाई का नाम आप जैसे लोग अपने-आप को तसल्ली देने के सिवा और कुछ नहीं कर सकते।  ........सच्चाई और आदर्शों की चक्की में ऐसा कोई गेहूँ नहीं पिसता जिससे पेट की भूख मिटाई जा सके।"
"पेट तो रोटी से ही भरता है सांगा साहब। और रोटी आदमी मेहनत से कमा लेता है। बात रोटी तक ही सीमित रहे- तब अलग बात है। बात हवस तक पहुँच जाए तो उसका कोई अंत नहीं । और सांगा साहब-आप इसी हवस के शिकार हो चुके हो। और इस हवस की वजह से ही हर रास्ते पर आपको कानून का सामना करना पङेगा"
     उपर्युक्त सांगा और शमशेर सिंह के परस्पर कथन से दोनों के चारित्रिक गुणों का स्पष्ट पता चलता है।
शमशेर सिंह का एक कथन और देखिए जिसमें वह अपने भाई शक्ति सिंह को संबोधित करता है।
"हां शक्ति- हमने आज तक अपनी मर्यादाओं के घेरे से बाहर पंख फङफङाने की कोशिश कभी नहीं की। हम आज तक जीते रहे हैं, तो अपने आदर्शों के बलबूते पर, अपनी ईमानदारी की नीव पर। अपनी सच्चाई की डगर पर ....।" (पृष्ठ-98)
   एक जगह पर शक्ति सिंह का कथन देखिए- "आज की दुनिया में अन्याय से लङना है तो अपने हाथ में जुल्म की तलवार पकङनी पङेगी। इसी तलवार से अन्याय को खत्म किया जा सकता है" (पृष्ठ-130)
अब ये बात जरा अजीब सी है की आदमी जुल्म कर कैसे अन्याय को खत्म कर सकता है। जब वह जुल्म की तलवार उठाऐगा तब तो अन्याय खत्म नहीं होगा, बल्कि बढेगा।
अब पता नहीं लेखक महोदय क्या कहना चाहते हैं।
     टाइगर का उपन्यास हस्ती मिटा दूंगा एक बदला प्रधान उपन्यास है। पढने के तौर पर उपन्यास में कोई विशेष बात नहीं है। उपन्यास में पाठक को प्रभावित करने की क्षमता नहीं है। पाठक अगर प्रथम भाग पढ भी लेगा तो वर्तमान समय में शायद ही वह इस उपन्यास के दूसरे भाग को पढने की इच्छा जताये।
  अगर लेखक चाहता तो इस उपन्यास को एक भाग में समेट सकता था, पर सोचने वाली बात ये है की लेखक दूसरे भाग 'सोने की लंका' में क्या लिखेगा। क्योंकि कहानी का इतना विस्तार नहीं है।
    
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उपन्यास- हस्ती मिटा दूंगा
दूसरा भाग- सोने की लंका
लेखक- टाइगर (JK VERMA, जगदीश कुमार वर्मा)
प्रकाशक- राजा पाॅकेट बुक्स
पृष्ठ- 240
मूल्य- 15₹ (अब मूल्य परिवर्तन संभव है)

1 comment:

  1. हिंदी पल्प उपन्यासों की ये एक कमी रही है. लोग बाग़ लिखने के लिए लिख देते हैं. एक सिचुएशन मिल गयी उस पर साधारण कहानी लिख दी. इसे पढ़कर मुझे अनिल सलूजा कि पढ़ी वकत का मारा की याद आ गयी. वो भी एक बदला प्रधान उपन्यास था. कहानी का अंत आपको पता रहता है लेकिन वो उस तक कैसे पहुँचता है ये लेखक ने रोचक कर दिया था. ऊपर से कथानक तेज गति का था तो मुझे बोरियत नहीं हुई थी. अगर ये दो बातें ऐसे उपन्यास से मुझे मिलती हैं तो मैं उसे अच्छा करार दे देता हूँ.
    ये भागों में आने वाले उपन्यासों से भी कोफ़्त होती है. अव्वल तो साफ़ जाहिर रहता है कि उपन्यास की कहानी को बेमतलब खीचा जाता है और दूसरा वो भाग कभी मिलता ही नहीं है. पिछले साल अनिल मोहन का उपन्यास हमला पढ़ा था और आज तक उसका दूसरा भाग जालिम पढने को नसीब नहीं हुआ. यही हाल वेद प्रकाश शर्मा जी के उपन्यास डायन २ के साथ था. ये सब मुनाफ़ा कमाने के जरिये हैं बस.
    किताब के ऊपर अच्छा लेख. जो संवाद आपने साझा किये हैं उनको पढ़कर उपन्यास पढने की रूचि तो जागृत होती है.

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