Friday, 31 March 2017

29. नया ज्ञानोदय- पत्रिका, मार्च अंक

 
लीलाधर मंडलोई के संपादन में निकलने वाली मासिक पत्रिका 'नया ज्ञानोदय' का मार्च अंक व्यंग्य को समर्पित है।
प्रस्तुत अंक में हिंदी के विशिष्ट व्यंग्यकारों को सम्मिलित किया गया है।
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से लेकर राजेन्द्र प्रसाद सक्सेना तक अर्थात प्राचीन से लेकर आधुनिक तक विशिष्ट व्यंग्यकार इस अंक में उपस्थित हैं।
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की प्रसिद्ध व्यंग्य रचना ' स्वर्ग में विचार-सभा का अधिवेशन', हरिशंकर परसाई की 'टार्च बेचने वाले'।
धर्म के नाम पर जनता को डरा कर लूटने वालों को 'टार्च बेचने वाले' में बेनकाब किया गया है।
वहीं पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र' की रचना ' सनकी अमीर' भी पढने योग्य है।

- "मेरा नाम शकुंतला है और मैं कण्व ऋषि के आश्रम में.....
- "माँ- पिता?"
-"माता मेनका है, जो इन्द्र के अखाङे में नाच करती है। पिता ऋषि विश्वामित्र हैं। जब तपस्या कर रहे थे, तब इन्द्र ने मेरी माँ...."
- "अच्छा-अच्छा, वह काण्ड, हाँ,  मैंने सुना है। तो तुम मेनका की पुत्री हो। तुम्हारी अम्मा के बङे चर्चे हैं। खेर, अपनी कहो...."
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_"ये तुम्हारे कण्व ऋषि हमेशा बाहर ही रहते हैं। जब राजा दुष्यंत आया, तब भी बाहर थे?"- घूण्डीराज ने पूछा।_
_" शकुंतला के सौभाग्य से, नहीं तो यह बुड्ढा हमें किसी से नहीं मिलने देता"_
_"सौभाग्य या दुर्भाग्य ? जानती नहीं, दुष्यंत ने शकुंतला को स्वीकार नहीं किया।"_
_"अरे, दुष्यंत का बाप भी स्वीकार करेगा..."_
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_कण्व पुराने ऋषि थे खुर्राट, बीस - पच्चीस सालों से आश्रम चला रहे थे और अच्छी रकम बना लेते थे_

_"पाखण्डी विश्वामित्र,.... अभी एक यज्ञ में मिल गये थे मैंने शकुंतला वाला मामला उठाया था।"- कण्व ऋषि ने कहा।
व्यंग्य के अतिरिक्त काव्य का रंग भी नया ज्ञानोदय में खूब बिखरा है।
"मोहब्बत इतनी तन्हा क्यों है,
कुबङी उम्र पर चलना क्यों है
धूँ-धूँ जलती चिताओं पर होता है
इसका सजना-धजना क्यों है.."- रविदत्त मोहता(पृष्ठ-92)
" आज सुहानी रात हुई
अपने से ही बात हुई
दिन के शोर शराबे में
तनहाई सौगात   हुई"- रामदरश मिश्र (पृष्ठ-93)
सर्वेश सिंह की एक बहुत ही मार्मिक कविता है, 'लौट जाओ बेटी'
वर्तमान समाज पर कटाक्ष करती यह कविता सच का आईना है।
"लौट जाओ मेरी बेटी
कि यहाँ धर्म, धर्म नहीं, अत्याचार है
न्याय, न्याय नहीं, बलात्कार है
खुदा, खुदा नहीं
धरती पर होता हुआ सनातन व्यभिचारी है"- सर्वेश सिंह (पृष्ठ-85)

इसी अंक में हिंदी कवयित्री गगन गिल का साक्षात्कार भी वर्णित है।
गगन गिल  का मानना है की रचना, मानवीय संवेदना बदलने की पूरी प्रक्रिया है।
इसके अलावा मशहूर रंगकर्मी वामन केन्द्रे का साक्षात्कार भी पठनिय है।
मार्च के इसी अंक से एक नया स्तम्भ भी प्रारंभ हो रहा है, " हासिये का असल रंग"।
और अंत में..
" एक साक्षात्कार के दौरान काशीनाथ ने अपने अग्रज नामवर सिंह से पूछा, "आपको किन लोगों से ईर्ष्या होती है?"
   उत्तर था- " उनसे, जो वही लिख या कह देते हैं जिसे सटीक ढंग से कहने के लिए मैं अरसे से बेचैन रहा होता हूँ। "
पत्रिका- नया ज्ञानोदय
संपादक- लीलाधर मंडलोई
प्रकाशक- भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली
अंक- मार्च, 2017
पृष्ठ-132
मूल्य- 30₹

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