Friday, 27 January 2017

15. कानून नहीं बिकने दूंगा- टाइगर

कानून नहीं बिकने दूंगा - टाईगर
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"हत्या..डकैती...हडताल...आगजनी..बलात्कार...अपहरण...
बम बलास्ट और घोटाले करने वालो सावधान।
कानून का तीसरा हाथ तुम्हारा पीछा कर रहा है।
खोजी पत्रकारिता पर लिखा गया एक उपन्यास ।
उपन्यास की कहानी एक रिक्शे वाले चरणदास पीपेवाले की पत्नी की हत्या से होती है,दुष्कर्म करने के पश्चात उसी के घर में उसकी हत्या कर दी जाती है। हत्या का आरोप लगता है शहर के प्रसिद्ध व्यवसायी विनोद कोठारी पर।
            कोठारी स्वयं को निर्दोष साबित करने के लिए शहर की प्रसिद्ध वकील मोनिका सान्याल की शरण में जा पहुंचता है। मोनिका सान्याल के बारे में प्रसिद्ध है की वह कभी केस नहीं हारी।
  और इस बार भी वह केस जीत जाती है और चरणदास पीपेवाला  को अपनी पत्नी की हत्या के जुर्म में अपराधी साबित कर देती है।
      और यहां से कहानी में प्रवेश होता है 'कानून के तीसरे हाथ' का।
यानि खोजी पत्रकार अमन चुघ का।
अमन चुघ अपने तीन साथियों भोलाराम, शशि मेहता और भीमसेन के साथ चरणदास पीपेवाले की पत्नी की हत्या की पहेली हल करता-करता जा टकराता है, अपने पत्रकार गुरु चमनलाल के हत्यारों से।
  यहाँ से कहानी में एक रोचक मोङ आता है और अमन चुघ के साथियों पर एक-एक कर वार होने शुरु हो जाते हैं।
यहां से बच गये, पर ये क्या ....?
अमन चुघ के तीनों साथी अमन के कार्य की सारी जानकारी कहीं और दे रहे हैं, वह भी तीनों एक दूसरे से चोरी-चोरी से।
  इन परिस्थितियाँ में क्या पत्रकार अमन चुघ कामयाब हो पायेगा।
  एक मामूली रिक्शा चालक की पत्नी की हत्या से चली यह कहानी खोजी पत्रकार चमन लाल तक जा पहुंचती है। चमन लाल वह शख्सियत थी, जिसके लिए कर्तव्य महत्वपूर्ण था।
और वहां से शहर के प्रसिद्ध पत्रकार, जज, वकील और व्यवसायी तक को अपनी चपेट में लेकर यह कहानी अपने मुकाम तक पहुंचती है।
  पात्र- कहानी में पात्रों की संख्या काफी है और सभी पात्र रोचक और स्वयं में एक रहस्य लिए बैठे हैं।
दर्शना पीपेवाला- एक रिक्शा चालक की पत्नी। जिसकी मौत कई चेहरों से नकाब उतार गयी।
विनोद कोठारी- प्रसिद्ध व्यवसायी और दर्शना पीपेवाल की हत्या का आरोपी।
मोनिका सान्याल जिससे नफरत करती है, पर फिर भी इसे कोर्ट में निर्दोष साबित करती है।
चरणदास पीपेवाला- कहानी के प्रारंभ में पीपेवाले का चित्रण जितना प्रभावशाली रूप से किया गया है, वह कुछ पृष्ठों के पश्चात कमजोर हो जाता है व अंत में तो मात्र उसका नाम ही रह जाता है।
"मेरे जैसा आदमी जब उल्टा-सीधा किया करता है तो वह अपना आगा-पीछा नहीं देखा करता। किसी की इज्जत का जनाजा निकालने से पहले वह यह नहीं सोचा करता की उस इज्जत की समाज में क्या कीमत है।"
एकदम  स्पष्टवादी आदमी है चरणदास।
अमन चुघ- खोजी पत्रकार। दर्शना पीपेवाले की हत्या की पहेली सुलझाता हुआ स्वयं भी मुजरिम बन कर रह जाता है।
चमनलाल- अमन चुघ का गुरु। एक खोजी पत्रकार। जो न्याय के लिए संघर्ष करता हुआ अपनी जान गवा बैठा। जिसके हत्यारों को पता नहीं चला।
शशि मेहता- अमन चुघ की सहयोगी । जो एक दिन स्वयं अमन को ही अपराधी के रूप में प्रस्तुत कर देती है।
"असफलता सफलता की पहली सीढी है अमन बाबू।"
भोलाराम व भीमसेन- दोनों पत्रकार हैं, अमन के सहयोगी । वास्तव में इनकी सत्यता कुछ और ही है।
मोनिका सान्याल- एक प्रसिद्ध वकील जो आज तक कोई केस नहीं हारी।
बुलाकी राम- मोनिका सान्याल का वाचाल नौकर। जिसकी सत्यता  भी कुछ और ही है।
"तू ही सारा विध्न पाया है"- बुलाकी गुस्से से बोला, -"तू मरीज नईं है, मरीज दे ना ते कलंक है।"
नीरा- मोनिका की सेक्रेटरी व अमन की प्रेमिका। 
इनके आलावा भी उपन्यास में बहुत से पात्र हैं।
इतने पात्रों के बावजूद भी लेखक सभी पात्रों में समन्वय बनाकर चला है। हालांकि इस वजह से कई पात्र उभर भी नहीं सके।
कथन - उपन्यास में पात्रों के कथन प्रभावशाली व पात्र के चित्रण को प्रभावी ढंग से व्यक्त करने वाले हैं।
चमन लाल- "एक जर्नलिस्ट ही अगर गलत रास्ते पर चल पङे तो वह समाज को सही रास्ते पर कैसे लायेगा? क्या तुम इतना भी नहीं जानते कि एक अखबारनवीस का सबसे बङा दायित्व यह होता है कि समाज को सही रास्ते पर चलाने का प्रयास करता रहे।"
उपर्युक्त वाक्य से चमनलाल की  विचारधारा का पता चलता है।
चरणदास पीपेवाला- एक अखङ किस्म का व्यक्ति । इसकी यह विशेषता इसके शब्दों से ही झलकती है।
मोनिका सान्याल को भी स्पष्ट शब्दों में कहता है
"कोठारी के साथ आपका रिश्ता है।"-स्पाट स्वर में बोला पीपेवाला, "वह रिश्ता कच्चा है या पक्का?, कमजोर है या मजबूत? इस बारे में कुछ भी नहीं बोलुंगा। मैं तो सिर्फ इतना ही कहूँगा इस लिहाज से दर्शना के साथ आपका भी रिश्ता है।"
जैसे आसमान से गिरी मोनिका। चेहरा राख की तरफ से सफेद पङता चला गया। वह पीपेवाला की तरफ यूँ देखने लगी जैसे कुकर्म करती रंगे हाथों पकङी गयी हो।
"आप बेकार में ही परेशान हो रही हैं। यह बात में किसी को नहीं बताऊंगा।" - पीपेवाल ने कहा।
ऐसी भी बात नहीं के पीपेवाला स्वयं के बारे में सत्यता नहीं जानता, वह तो स्पष्ट कहता है- "जनाब, मैं गरीब आदमी हूँ । भूखा-नंगा आदमी हूँ । उपर से शराबी-कबाबी आदमी हूँ।   मेरी तो  समाज में धेले की भी ईज्जत नहीं है
कुछ कथन तो पीपेवाले के पाठक शायद ही भूलें।
जब वह वकील मोनिका सान्याल के कार्यालय में उससे मिलने जाता है। तब सेक्रेटरी नीरा कहती है-
"मैङम बिना अपाॅइंट किसी से नहीं मिलती।"
"मुझसे मिलेगी",- चरणदास पीपेवाला बङे आराम से बोला,-"इसलिए मिलेगी क्योंकि जब वह मेरे घर आयी थी तब मैं भी उनसे बिना अपाॅइंटमेंट के ही  मिला था।"
ऐसा पात्र उपन्यास के प्रारंभ में हर पात्र पर भारी पङता गया है पर जैसे-जैसे उपन्यास आगे बढता है, चरणदास पीपेवाला उपन्यास के पृष्ठों से गायब हो जाता है।
अगर लेखक इस पात्र को आगे भी प्रस्तुत करता तो उपन्यास काफी रोचक बन जाता।  
उपन्यास के कुछ प्रसंग अनावश्यक प्रतीत होते हैं।
जैसे पीपेवाले के चार बच्चों का ज्यादा चित्रण करना और वह भी की चारों बच्चे दस साल की कम उम्र के हैं पर तीनों पत्रकारों पर भारी पङते हैं व उन्हें बांध देते हैं।
इसके अलावा उपन्यास में ज्यादा पात्रों को स्थान देना व बाद में उनके चरित्र के साथ इंसाफ न होना।
यह एक मर्डर मिस्ट्री है, कहानी अच्छी है, प्रारंभ भी बहुत अच्छा है लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढती गयी वैसे-वैसे लेखक कहानी पर से नियंत्रण खोता गया।
उपन्यास का शीर्षक - शीर्षक है 'कानून नहीं बिकने दूंगा' लेकिन लेखक स्वयं शीर्षक के साथ इंसाफ नहीं कर पाया। लेखक कहता है जब कानून के दोनों हाथ (पुलिस व वकील) बिक जाते हैं तब तीसरा हाथ (पत्रकार) कानून का रक्षक बनता है। लेकिन यहाँ तो स्वयं पत्रकार महोदय भी कानून की रक्षा करने की जगह कानून हाथ में ले लेता है।
उपन्यास का नायक भी असली मुजरिम को जानते हुए उस पर हाथ नहीं डाल पाता लेकिन नूतन जैसी निर्दोष महिला का कत्ल बेवजह कर देता है।
  लगता है जैसे लेखक महोदय उपन्यास लिखते-लिखते भूल गये की वह क्या लिखने बैठे थे।
कुल मिला कर उपन्यास एक बार पढा जा सकता है।
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उपन्यास- कानून नहीं बिकने दूंगा।
लेखक- टाईगर
प्रकाशक- राजा पाॅकेट बुक्स- दिल्ली

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