Saturday, 19 May 2018

115. मेरी मदहोशी के दुश्मन- आबिद रिजवी

मस्ती से भरा एक का रोमांटिक उपन्यास।
मेरी मदहोशी के दुश्मन- आबिद रिजवी, रोमांटिक-थ्रिलर उपन्यास।
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  जासूसी उपन्यास जगत का जब से सुनहरी दौर बिता उसी के साथ बहुत से लेखक गुमनामी के अंधेरे में‌ खो गये।
इन्हीं लेखकों में से एक लेखक है आबिद रिजवी साहब जिन्होंने वक्त के साथ स्वयं को बदला और लेखन क्षेत्र में सतत सक्रिय रहे।
लेकिन उपन्यास के क्षेत्र में इन्होंने लगभग बीस साल बाद पुन: पदार्पण किया। इनके इस आगमन का आगाज होता है रवि पाकेट बुक्स से प्रकाशित इनके उपन्यास 'मेरी‌ मदहोशी के दुश्मन' उपन्यास से।
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    नीलू कक्षा दस की एक विद्यार्थी है। कुछ असामाजिक तत्व नीलू का अपहरण करना चाहते हैं। तब जासूस कामिनी बट उनसे जा टकराती है और दुश्मनों को मात देती है।
   हालांकि उपन्यास की कहानी मात्र इतनी है पर लेखक ने अपनी‌ कल्पना शक्ति से इसमें विविध रंग भरे हैं। ये रंग एक्शन और रोमांस के हैं। 
         उपन्यास रोचक और हल्का-हल्का प्रेम रस लिए हुये है। इस प्रेम रस में वह ताजगी है जो पाठक को आनंदित करती है और इस आनंद सागर में बहता हुआ पाठक उपन्यास के पृष्ठ दर पृष्ठ पढता चला जाता है। 
        वर्तमान में जहां अधिकांश उपन्यास मर्डर मिस्ट्री और दिमागी उलझन वाले हैं वहीं आबिद रिजवी साहब का यह उपन्यास सावन की हल्की सी बरसात की उस फुहार की तरह हैं जो तन के साथ मन को भी भीगों देती हैं।
            




भाषा शैली
इस उपन्यास की सबसे बङी विशेषता है इसकी भाषा शैली। आबिद रिजवी साहब एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं, साहित्य के क्षेत्र में विभिन्न विषयों पर लिख चुके हैं। अत: स्वाभाविक ही है कि इनकी भाषा शैली बहुआयामी होगी।
एक एक्शन उपन्यास में इन्होंने कोमलकांत शब्दावली का प्रयोग किया है। ऐसी शब्दावली जो पाठक को सहज की आकर्षित कर लेती है।
उस दिन मौसम बहुत रोमांटिक था। सुरम ई बादलों‌के नन्हें -मुन्ने टुकङे, धुनी हुयी रूई की तरह आसमान पर बिखरे हुए थे।
ठण्डी हवा थी, लेकिन चुपके-चुपके धीमे-धीमे इस तरह चल रही थी, जैसे महबूब के बेडरूम में‌ पहुँचकर अचानक चौंका देना चाहती हो। (पृष्ठ- 07)

उपन्यास में लेखक महोदय ने कहानी पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया इसलिए कहानी अपने मूल‌ विषय से भटक जाती है।
उपन्यास में मुख्य खलनायक का किरदार हावी रहता है लेकिन खलनायक संपूर्ण उपन्यास में‌ एक बार दृष्टिगोचर होता है और वह भी पीठ किये हुए।
 उपन्यास

निष्कर्ष- 
            
     उपन्यास के विषय में उपन्यास के अंतिम‌ कवर पृष्ठ पर लिखी हुयी इबारत प्रकाश डालती है।
शहद की चाशनी की‌मधुरिमा में डूबा एक ऐसा थ्रिलर उपन्यास, जिसमें हुस्न की चाहत के साथ देश प्रेम की भावना से लबरेज एहसासात भी हैं।
        अगर पाठक वर्तमान एक्शन, मर्डर मिस्ट्री से अलग हटकर कुछ रोमांटिक पढना पसंद करते हैं तो यह उपन्यास आपका मनोरंजन करेगा। हालांकि कहानी के स्तर पर उपन्यास काफी पीछे रह गया।
  फिर भी रोमांस और एक्शन पसंद पाठकों को उपन्यास पसंद आयेगा।
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उपन्यास- मेरी मदहोशी के दुश्मन
लेखक- आबिद रिजवी
पृष्ठ- 269
मूल्य- 80₹
प्रकाशक- रवि पॉकेट बुक्स- मेरठ
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अन्य लिंक
1. आबिद रिजवी जी का परिचय
2. आबिद रिजवी जी से साक्षात्कार

Sunday, 13 May 2018

116. रिवेंज- एम. इकराम फरीदी

रहस्य से भरी एक बदले की कथा।
रिवेंज- एम. इकराम फरीदी, सस्पेंश-थ्रिलर, रोचक, पठनीय।
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उत्तर प्रदेश के युवा लेखक एम. इकराम ‌फरीदी ने जो कम समय में पाठकवर्ग में जो अपनी पहचान स्थापित की है वह वास्तव में प्रशंसनीय है।‌ इनकी पहचान स्थापित होने की एक वजह तो यह है की लेखक लंबे समय से गुमनामी में संघर्ष करता रहा और जब पाठकवर्ग के सामने आया तो एक से बढकर एक रचनाएँ दी और सभी रचनाएँ समाज को संदेश देने के साथ-साथ विषय वस्तु में नवीनता लिए हुए हैं।
                    द ओल्ड फोर्ट, ट्रेजङी गर्ल, गुलाबी अपराध, ए टेरेरिस्ट और अब प्रस्तुत उपन्यास रिवेंज सभी की कहानी एक दूसरे से पूर्णतः अलग है। इसी विशेषता के चलते फरीदी साहब के पाठकों में‌ वृद्धि हुयी।


प्रस्तुत उपन्यास की कहानी बहुत रोचक है, हालांकि इनका पूर्व उपन्यास 'गुलाबी अपराध' भी मर्डर मिस्ट्री था लेकिन दोनों की पृष्ठभूमि बहुत अलग है।

"सर.....।"- सुधीर ने भूमिका तैयार की और चेतना का मोबाइल दिखाता हुआ बोला-" यह मेरी बेटी का फोन है, अभी थोङी देर पहले इस पर धमकी मिली है कि मेरे पूरे परिवार को मार दिया जाएगा- मेरे बेटे मोनू को इस वीक के लास्ट तक‌ मर्डर कर दिया जायेगा।"
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इंस्पेक्टर ने नंबर देखा। काॅल हिस्ट्री देखी।
................
"कौन है यह?"
"बकौल इसके मेरा भतीजा अंशु है, जो चार महीने पहले एक सङक दुर्घटना में मर चुका है।"
"मतलब?"- इंस्पेक्टर तो चौंक उठा- " जो मर चुका है, वह कैसे फोन कर सकता है?"
"कल रात ग्यारह बजे वह मेरे बेटे सोनू से मिलने भी उसके कमरे में आया था।"
"कौन आया था?"
"मेरा भतीजा अंशु।"
"जो मर चुका है?"
"जी हां, सर।"
"तुम पागल तो नहीं हो- तुम लोग कहीं पागलखाने से तो नहीं छूटे हो?"
"सच्चाई वही है सर जो मैं बता रहा हूँ ।"-सुधीर रो‌ देने वाले स्वर में बोला।
(पृष्ठ-31-32)
.....और अनंतः इंस्पेक्टर भी इस बात को मानने को मजबूर हो जाता है।
"अजीब बात है।"- इंस्पेक्टर बेंत को ठकठकाते हुए इधर-उधर चहलकदमी करता हुआ बोला- " जो धमका रहा है कत्ल करने को, वह मर चुका है- वैरी इंस्ट्रेस्टिंग -लेकिन अब उसको ढूंढा कहां जाये- क्या श्मशान घाट में?" (पृष्ठ-39)
कत्ल हुआ बाकायदा धमकी देकर हुआ लेकिन कोई कातिल साबित न हुआ, कोई सबूत न‌ मिला और सबसे सामने कत्ल हुआ।
और दूसरी तरफ एक मैना थी। जिसने चैलेंज किया था।
मैना चलकर थोङा करीब आई। मात्र थोङा सा गैप देकर खङी हुयी और आँखों में आँखें डालकर फुसफुसाई -"फ्राइङे को मोनू का कत्ल हो जाएगा- रोक सको तो रोक लेना।"(पृष्ठ-47)



         प्रस्तुत उपन्यास 'रिवेंज' जैसा की नाम से ही पता चलता है यह एक बदला प्रधान कथा है, लेकिन उपन्यास ‌में‌ चुनौती है पुलिस और जासूस के लिए असली अपराधी तक पहुंचने की, हालांकि कातिल सामने है लेकिन सबूत नहीं ।
      कत्ल होता है मजबूत सुरक्षा व्यवस्था के बीच लेकिन कोई कातिल साबित नहीं हो पाता और न ही कोई सबूत मिलता है।

इकराम फरीदी साहब की एक विशेषता है की वे मूल कथानक के साथ-साथ अन्य सामाजिक बुराईयों का वर्णन और विरोध इस प्रकार दर्शाते है की मूल कहानी पर कहीं कोई रुकावट दृष्टिगत नहीं होती।
   प्रस्तुत उपन्यास में भी नशा, भूत-प्रेत, तांत्रिक आदि पर अच्छा प्रहार किया है।
नशे पर लिखा है- मगर यह नशे का मार्ग व्यक्ति को कहीं भी संतुष्ट नहीं करता है। व्यक्ति की मानसिकता अधिक आग्रह की रहती है और कोई भी नशेङी निरंतर गलती यह करता है कि वह नशे से संतुष्ट होना चाहता है। (पृष्ठ-21)
वर्तमान तांत्रिक वर्ग के व्यापार पर गहरी चोट की गयी है और उपन्यास के माध्यम से इनका व्यापार भी दर्शाय
 गया है
समय के साथ -साथ हर तांत्रिक समयकार्ड का बङा विशेषज्ञ होता जा रहा है। याद पङता है कि कुछ वर्षों पूर्व जब समय कार्ड का चलन हुआ था तो उस समय 72 घण्टे की समय सीमा बांधी गयी थी। (पृष्ठ-152)
और अब यह समय सीमा कब होने लग गयी।

72 घण्टे....60 घण्टे....24घण्टे.....20 घण्टे.....समाधान नहीं तो फीस वापस....दुगने पैसे वापस..
और अभी की लेटेस्ट खबर है मात्र दस मिनट।
मौलवी साहब बंगाल वाले। (पृष्ठ-153
)


कथन-
अच्छे कथोपथन किसी भी कहानी के प्राण होते हैं। प्रस्तुत उपन्यास में ऐसे क ई कथन/संवाद है जो पाठक को सहज की आकृष्ट करते हैं।
"वह हम ढूंढ निकालते हैं- हम‌ पुलिस वाले हैं, हम‌ रस्सी का सांप बना देते हैं।"
"आपका सामना अभी शातिर मुजरिमों से नहीं पङा है- वरना आप सांप को रस्सी कहने लगते
।" (पृष्ठ-47)
- "क्या कहते हो?"- एस.एस. पी. की तो बुद्धि फिरकनी नब गयी।
घूमती बुद्धि को उन्होंने थामा तथा एतराज किया-" ऐसा कैसे हो सकता है?"(पृष्ठ-65)
-मूर्ख औरत, आत्मा को कभी गलतफहमी नहीं होती- यहाँ यमलोक के रजिस्टर में सबकुछ दर्ज है, मैं पढ चुका हूँ कि तूने क्या प्लानिंग रची।
"(पृष्ठ-136)
- दुश्मनी के कोई पैमाने नहीं होते, बस अपना दिमाग सिरफिरा होना चाहिए- एक छोटी सी बात भी अगर बुरी लग जाये तो सनकी आदमी कत्लेआम मचा देता है।"(पृष्ठ-197)




कुछ कमियां-
उपन्यास में‌कई जगह कुछ गलतियां दृष्टिगत होती हैं। जो कमजोर संपादन या लेखन का वजह से उपजी हैं। अगर उपन्यास पर कुछ अतिरिक्त मेहनत की जाती तो ऐसा न होता।
उपन्यास में‌ लेखक ने कई जगह शुद्ध उर्दू के शब्दों का प्रयोग किया है जो सामान्य पाठक को थोङा परेशान कर सकता है। पाठक भावार्थ तो ग्रहण कर सकता है लेकिन शब्दार्थ में समस्या आ जाती है।
जैसे - खदसा,
- "मोनू को अंशु का हमशक्ल नजर आया है तो स्पष्ट है कि कम से कम किशोर तो मैना का साथी है।" (पृष्ठ-51)
कौन किशोर?
"क्या?"- नितिन चकित स्वर में बोला -" दिन निश्चित कर दिया? फोन किसके पास आया, आपके पास?"(पृष्ठ-141)
उपन्यास में नितिन नाम का कोई व्यक्ति नहीं है।
- ननंद शब्द को बार-बार नंद लिखा है।

- "मम्मी, इस डिटेक्टिव को काॅल करें।"
"लगा काॅल।"
चेतना ने प्रोफाइल में दिये संपर्क नंबर पर काॅल लगाई। (पृष्ठ-37)
- ज्योतिका ने चेतना से पूछा- "उसका कांटेक्ट नंबर मिला?"
"हां मम्मा, मिला- कहो तो काॅल करुं?"
"लगा फोन।"
चेतना ने रिंग छोङ दी। (पृष्ठ-49)
लेखक ने एक दृश्य को दो बार दर्शा दिया।
और ऐसा तब भी होता है जब अंशु का फोन आता है और उसके फोन की डिटेल्स निकलवाने की चर्चा चलती है।

- कौशिक की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। मिशन पूर्णतः असफल रहा था। (पृष्ठ-235)
जबकि मिशन सफल रहा था।
भारतीय कानून के मुताबिक सम्पति में बहू का अधिकार नहीं होता है- सम्पति का मालिक या तो पति होता है या फिर बच्चे। (पृष्ठ-252)
मेरे विचार से ऐसा नहीं है। पति की मृत्यु पश्चात संपति पर पत्नी का कानूनन अधिकार होता है।


निष्कर्ष-
उपन्यास 'रिवेंज' एक बदला प्रधान कथा है। एक पारिवारिक रंजिश के चलते कैसे एक परिवार तबाह हो गया। हमारा स्वार्थ कैसे किसी के परिवार को बर्बाद कर सकता है, इसका उदाहरण है एम. इकराम‌ फरीदी का उपन्यास'रिवेंज' और फिर कैसे लोग अपना बदला लेते हैं।
उपन्यास मर्डर मिस्ट्री होते हुए भी थ्रिलर है। पाठक को कातिल का आभास है लेकिन उसका निस्तारण अंत में ही होता है।
उपन्यास में लेखक की जल्दबाजी स्पष्ट झलकती है, अगर लेखक/संपादक थोङा सा अतिरिक्त श्रम करते हो छोटी-छोटी गलतियों से बचा जा सकता था।
उपन्यास का आवरण पृष्ठ भी कहानी के अनुरुप है।
उपन्यास रोचक और पठनीय है। कहानी दमदार है जो पाठक को बांधे रखने में‌ सक्षम है।

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उपन्यास- रिवेंज
लेखक- एम. इकराम‌ फरीदी
प्रकाशक- रवि पॉकेट बुक्स
पृष्ठ- 254
मूल्य-80₹
लेखक संपर्क- 9911341864 (W/A)

लेखक के आगामी उपन्यास
- सम-प्रीत (समलैंगिक संबंध)
-चैलेंज होटल (हाॅरर)
- अवैध
               





Saturday, 5 May 2018

113. बैंक राॅबरी- एन. सफी

एक चालाक अपराधी की कहानी।
बैंक राॅबरी- एन. सफी, जासूसी उपन्यास, मध्यम स्तर।

एन सफी का प्रस्तुत उपन्यास एक छोटी सी बैंक राॅबरी से आरम्भ होता है और कई घटनाओं से गुजरता हुआ अंततः अपने अंजाम तक जा पहुंचता है।
    उपन्यास हालांकि लघु कलेवर का ही है लेकिन रोचक है। तात्कालिक समय की दृष्टि से देखें तो यह उपन्यास पाठक को स्वयं में बांधने में सक्षम है।
                 कहानी में कई‌ मोङ आते हैं, जो पाठक को प्रभावित करने में कुछ हद तक सक्षम है। 
          उपन्यास की कहानी की बात करें तो यह आरम्भ होती है एक डैनी नामक व्यक्ति द्वारा एक बैंक की राॅबरी से। बैंक राॅबरी की रकम के साथ डैनी एक नये चेहरे के साथ शहर में एक नयी जिंदगी आरम्भ करता है।
        उसी शहर में एक डांसर सैफाली के साथ शराफत की नयी जिंदगी जीता है। लेकिन चोर चोरी से जाये हेराफेरी से न जाये वाली कहावत डैनी पर लागू होती है। और एक दिन डैनी को अपने कर्मों की सजा मिलती है।
              उपन्यास की कहानी छोटी सी है। कहानी आरम्भ चाहे बैंक राॅबरी से होता है लेकिन कुछ पृष्ठों के पश्चात कहानी पूर्णतः बदल जाती है। 
कहानी को तीन चरणों में विभक्त कर सकते हैं।
1. डैनी द्वारा बैंक राॅबरी
2. डैनी और शैफाली की मुलाकात
3. डैनी के कर्मों की सजा
उपन्यास का आरम्भ जहां कुछ रोचक है वहीं शैफाली और डैनी की मुलाकात वाली कहानी उपन्यास में थोङा धीमापन लाती है। उपन्यास का समापन उपन्यास में पुनः रोचकता व प्रवाह पैदा करता है

     उपन्यास में कई गलतियाँ है जो उपन्यास को बहुत ज्यादा प्रभावित करती हैं।
- वह सुबह से भूखा था। कोई चारा न देखकर उसने माँस को कच्चा ही चबाने की कोशिश की। उसने अपनी तलवार से राजेन्द्र के चेहरे का कच्चा माँस छीलने की कोशिश की। (पृष्ठ-23)
- डैनी ने राजेन्द्र के उस चेहरे की सर्जरी बना कर अपने चेहरे पर फिट कर ली। (पृष्ठ-29)
- यह कैसे संभव है की कोई आदमी किसी के चेहरे से अपने चेहरे पर सर्जरी कर लेगा। यह तो बिलकुल असंभव।
- डैनी जब शहर में राजेन्द्र सिंह बेदी का चेहरा(मास्क) लगाकर घूमता है  उसे राजेन्द्र बेदी के परिचित कहीं क्यों नहीं मिलते और स्वयं डैनी को भी डर होना चाहिए इस बात का।
- राजेन्द्र सिंह बेदी की हत्या हो जाती। लेकिन पुलिस उसकी कहीं कोई जांच नहीं करती।
- राजेन्द्र सिंह बेदी के परिवार वाले भी राजेन्द्र सिंह बेदी की कोई खोजबीन नहीं करते।

- निष्कर्ष
उपन्यास मध्यम स्तर का है। जिसकी कहानी का आरम्भ रोचक तरीके से होता है लेकिन मध्य भाग उपन्यास को कमजोर बना देता है। लेखक ने भी कई जगह अति कल्पना का सहारा लिया है जो की सही नहीं लगता। लेखक की कुछ अतिरिक्त मेहनत से उपन्यास अच्छा बन सकता था।
उपन्यास छोटा सा है एक बार मनोरंजन की दृष्टि से पढा जा सकता है।

उपन्यास के पात्र
डैनी- बैंक राॅबरी कर्ता
राजेन्द्र बेदी- शहर का व्यापारी
इंस्पेक्टर रमेश देव
इंस्पेक्टर अशोक
हवलदार चेतराम
पुलिस कर्मी- साधुराम, छज्जू राम
शैफाली- एक डांसर, डैनी की प्रेमिका
महावीर प्रसाद- उपन्यास का एक पात्र
जगन- एक चोर
कर्नल विनोद- जासूस
हमीद- कर्नल विनोद का साथी
कासिम- कर्नल विनोद-हमीद का साथी, एक हास्य पात्र।

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उपन्यास- बैंक राॅबरी
लेखक- एन. सफी
प्रकाशक- नीलिमा पाॅकेट बुक्स (2238, किनारी बाजार, दिल्ली-6)
पृष्ठ- 12
अनुवादक- वीरेन्द्र लोहचन

Friday, 6 April 2018

109. काजर की कोठरी- देवकीनंदन खत्री

जब शादी के दिन गायब हो गयी पत्नी...
काजर की कोठरी- देवकीनंदन खत्री, थ्रिलर, औसत।
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संध्या होने में अभी दो घण्टे की देर है मगर सूर्य भगवान के दर्शन नहीं हो रहे, क्योंकि काली-काली घटाओं ने आसमान को चारों तरफ से घेर लिया है। जिधर निगाह दौङाइए मजेदार समा नजर आता है और इसका तो विश्वास भी नहीं होता कि संध्या होने में अभी कुछ कसर है।
                यह पंक्तियां देवकीनंदन खत्री जी के प्रसिद्ध उपन्यास 'काजर की कोठरी' की हैं।
अय्यारी, तिलस्मी जैसे उपन्यासों में महारथ हासिल खत्री का यह उपन्यास उनके अन्य उपन्यासों से थोङा सा अलग है क्योंकि इसमें तिलिस्म या अय्यारी नहीं बल्कि धोखेबाजी मुख्य है। पाठक को प्रथम पृष्ठ से ही सब कुछ पता चल जाता है की उपन्यास का अंत क्या होगा।
    
       जिमींदार कल्याण सिंह के पुत्र हरनंदन की शादी लाल सिंह की पुत्री सरला से होने वाली है। शादी के दिन सरला घर से गायब पायी जाती है। उसके कमरे में खून के छींटे मिलते हैं।
                दूसरी तरफ कल्याण सिंह के कमरे में एक पिटारा मिलता है जिसमें खून से सने वे कपङे होते हैं जो कल्याण सिंह के परिवार की तरफ से सरला को रस्म अनुसार दिये गये थे।
                     दोनों परिवार हैरान-परेशान और दुखी हैं कि आखिर सरला कहां गायब हो गयी।
आखिर हरनंदन सिंह सरला के गायब होने ले रहस्य को सुलझाने का निर्णय लेता है।

- सरला आखिर कहां गायब हुयी?
- क्या सरला जिंदा/ मुर्दा थी?
- कौन थे अपराधी?
- क्या हरनंदन सिंह अपने कार्य में सफल हुआ?
- खून से सने कपङों‌ का क्या रहस्य था?
    ऐसे एक नहीं अनेक प्रश्नों का उत्तर तो देवकीनंदन खत्री के उपन्यास काजर की कोठरी को पढकर ही मिल सकते हैं।
      
    उपन्यास सामान्य है। पाठक को उपन्यास के आरम्भ में ही मूल कथा और खलनायक का पता चल जाता है।  शेष उपन्यास में मात्र यही रहस्य बाकी रह जाता है की हरनंदन सिंह कैसे सरला का पता लगता है।

संपादक महोदय ने उपन्यास के आरम्भ में ही इतना कुछ लिख दिया की उपन्यास बिना पढे भी काम चल सकता है। आप भी पढ लीजिएगा।
   काजर की कोठरी सन् 1900 के आसपास लिखा गया उपन्यास है जिसमें वेश्या सरीखी, दुष्चरित्र, धोखेबाज और कुटिल समझी जाने वाली स्त्री के चरित्र का औदात्य दिखाया गया है। जमींदार और वेश्या के आत्मीय, सरल और सहज संबंधों को इस उपन्यास में वाणी दी गयी है।
            यह उपन्यास मूलतः वेश्या जीवन पर लिखा गया है। जमींदार हरनंदन सिंह का विवाह सरला के साथ होने वाला है। किंतु वह विवाह पूर्व ही गायब कर दी जाती है- गायब होने के स्थान पर खून से सनी एक पोटली मिलती है। हरनंदन सिंह शादी में आयी वेश्या से संबंध स्थापित कर लेते है और गायब हुयी सरला का पता लगाते हैं। सरला का चचेरा भाई उसका विवाह हरनंदन सिंह के साथ नहीं करना चाहता- बल्कि चाचा की वसीयत के अनुसार उसका विवाह कहीं अन्यत्र करा, वह आधे धन का मालिक बनना चाहता है। हरनंदन सिंह वेश्या को अपने विश्वास में लेकर अंत में सरला का पता लगा लेते हैं और अपराधी दण्डित होते हैं।
 
    उपन्यास में विशेष तौर से वेश्या जीवन के दोहरे चरित्र का खूब वर्णन किया है।
 
उपन्यास कोई विशेष नहीं है। मात्र देवकीनंदन खत्री का उपन्यास होने के नाते या वेश्या जीवन के दोहरे चरित्र को देखने की दृष्टि से पढा जा सकता है।

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उपन्यास- काजर की कोठरी
लेखक-    देवकीनंदन खत्री (18.06.1861- 04..8.1913)
वर्ष- 1900 (लगभग)
प्रकाशक- साहित्यागार, SMS हाइवे -जयपुर
पृष्ठ- 83

Thursday, 5 April 2018

108. सूरज का सातवाँ घोङा- धर्मवीर भारती

टुकङो में विभक्त एक दर्द भरी प्रेम कहानी।
सूरज का सातवाँ घोङा- धर्मवीर भारती, साहित्यिक उपन्यास, रोचक, पठनीय, उत्तम।
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    धर्मवीर भारती द्वारा लिखा गया उपन्यास सूरज का सातवाँ घोङा एक प्रयोगात्मक उपन्यास है। कथा और शिल्प दोनों स्तरों पर इसमें अपने समय में प्रयोग किये गये थे। यह प्रयोग सफल भी रहा। क्योंकि सन् ..में प्रकाशित इस उपन्यास को आज भी पाठक उतने ही चाव से पढता है जितना इसके प्रकाशन के वक्त पढा गया था।
      निर्देशन श्याम बेनेगल द्वारा इस उपन्यास पर इसी शीर्षक से निर्मित फिल्म सफल भी रही और उसे राष्ट्रीय...पुरस्कार भी प्राप्त हुआ।
     
       सूरज का सातवाँ घोङा एक प्रेम कथा है। यह एक कहानी है या उपन्यास ऐसा पाठक को लग सकता है । मूलतः यह उपन्यास है लेकिन इसके प्रस्तुतीकरण का तरीका कहानी जैसा ही है। यह स्वयं में एक प्रयोग है।
     पूरा घटनाक्रम माणिक मुल्ला के कथित है।

गर्मि का समय है, दोपहर का। कुछ बच्चे माणिक मुल्ला के कमरें में हर रोज एकत्र होते हैं और माणिक मुल्तान उन्हें हर रोज एक प्रेम कहानी सुनाता है। ये कहानियाँ प्रथम दृष्टया अलग -अलग नजर आती है लेकिन अंत में जाकर एक हो जाती हैं। लेकिन किसी भी कहानी में कॊई बिखराव नहीं है। सभी एक दूसरे से आबद्ध है। इन सभी कहानियाँ को आपस में आबद्ध करने का कार्य स्वयं माणिक मुल्ला ही करता है क्योंकि वह प्रत्येक कहानी से स्वयं भी जुङा हुआ है।
         
    कहानी चाहे जमुना की हो, चाहे लिली या सती की। सभी से माणिक मुल्ला का संबंध रहा है और सभी कहानियाँ में एक टीस भी है। एक ऐसी टीस जो पाठक के हृदय को चीर जाती है। 
        
      उपन्यास में माणिक मुल्ला के माध्यम से क ई कहानियों व्यक्त हुयी हैं लेकिन कोई भी प्रेम कहानी अपने लक्ष्य तक न पहुंची। यही जीवन की विडंबना है और इसी विडंबना को विभिन्न पात्रों के माध्यम से व्यक्त किया गया है।
            जमुना को तन्ना बहुत पसंद है, वह उससे शादी की इच्छुक है। लेकिन समाज की मर्यादा इस प्रेम में बाधक है। तन्ना का बाप महेसर भी इस प्रेम को स्वीकृति नहीं दे पाता। जमुना माणिक मुल्ला के प्रति भी बहुत लगाव रखती है लेकिन इसका प्रेम कहीं भी सफलता प्राप्त नहीं कर पाता।
        एक है लिली उर्फ लीला जो माणिक मुल्ला से स्नेह रखती है। लेकिन आधुनिक विचारों की समर्थक है। लीला का विवाह तन्ना से हो जाता है। लेकिन एक बच्चे के पश्चात भी दोनों में दाम्पत्य प्रेम की कमी दिखाई देती है।
         सती जो की एक आत्मनिर्भर महिला की भूमिका में है लेकिन उसकी पारिवारिक स्थिति उसे इस स्थिति में‌ ले आती है जहाँ वह न जी सकती है न‌ मर सकती है। सती और माणिक मुल्ला में स्नेह की डोर है। लेकिन परिस्थितिया इस डोर को तोङ देती हैं।  दूसरी तरफ तन्ना का बाप महेसर सती की आर्थिक व पारिवारिक परिस्थितियों का भरपूर फायदा उठाने की सोचता है।
     
एक तरह से सभी कहानियाँ माणिक मुल्ला से संबंध रखती हैं और अपना स्वतंत्र अस्तित्व भी।

इस उपन्यास में मात्र प्रेम कहानियाँ ही नहीं है, इनके साथ-साथ भारत के मध्यवर्गीय समाज का चित्रण, प्रेम की पीर, मार्क्सवाद और आधुनिक कहानी के संबंध में भी बहुत कुछ पढने को मिलता है।
  
        आजकल के लेखक जिस प्रकार कहानी के शीर्षक को अति आकर्षक बनाने में लगे रहतॆ हैं उस पर माणिक मुल्ला के माध्यम से व्यंग्य किया गया है- "...तुम लोग कहानी सुनने आये हो या शीर्षक सुनने? या मैं उन कहानी लेखकों में से हूँ जो आकर्षक विषयवस्तु के अभाव में आकर्षक शीर्षक देकर पत्रों के संपादकों और पाठकों का ध्यान खींचा करते हैं।" (पृष्ठ-43)
"टेकनीक पर ज्यादा जोर वही देता है जो कहीं न कहीं अपरिपक्व है...फिर भी टेकनीक पर ध्यान देना बहुत स्वस्थ प्रवृत्ति है बशर्ते वह अनुपात से अधिक न हो।" (पृष्ठ-84)
     
मध्यमवर्गीय समाज के संबंध में लिखा है- " हम‌ सभी निम्न मध्य श्रेणी के लोगों की जिंदगी में हवा का ताजा झोंका नहीं है...।"(पृष्ठ-42)

कुछ विशेष कथन-
- प्यार आत्मा की गहराइयों में सोये हुए सौन्दर्य के संगीत को जगा देता है। (पृष्ठ-69)

उपन्यास खण्ड और शीर्षक-
उपन्यास को सात खण्डों में विभक्त किया गया है।  प्रत्येक खण्ड का नाम‌ दोपहर दिया गया है, क्योंकि यह कहानियाँ गर्मी की दोपहर में सुनायी गयी हैं। हिंदी साहित्य में विभिन्न ग्रंथों में खण्डों के नाम अलग-अलग मिलते हैं, जैसे समय( पद्मावत में), अंक, भाग, इत्यादि।
    प्रत्येक खण्ड से पूर्व एक छोटा सा अध्याय भी अनध्याय नाम से मिलता है।

निष्कर्ष-
  धर्मवीर भारती द्वारा लिखा गया उपन्यास सूरज का सातवाँ घोङा एक प्रयोगशील उपन्यास है।
कथा स्तर पर यह उपन्यास मानव के अंतर का चित्रण करता है। यह उस मध्यमवर्गीय समाज का चित्रण करता है जो करना कुछ और चाहता है लेकिन उसकी परिस्थितियां उसे करने नहीं देती। ऐसी ही विषम परिस्थितियों में घिरे माणिक मुल्ला, जमुना, लिली, सती और तन्ना का चित्रण इस उपन्यास में मिलता है।
       कहानी रोचक और मन को छू लेने वाली है। उपन्यास का कलेवर लघु है और कहानी में तीव्रता भी है जो पाठक को स्वयं में समेटे रखती है।
      अगर आप यथार्थवादी प्रेम कहानी पढना पसंद करते हो तो यह उपन्यास अवश्य पढें ।

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उपन्यास- सूरज का सातवाँ घोङा
लेखक- धर्मवीर भारती
प्रकाशक-
वर्ष-
पृष्ठ- 114
मूल्य-

 इस उपन्यास को इस लिंक पर निशुल्क पढा जा सकता है।-  सूरज का सातवाँ घोङा